बुधवार, 29 अप्रैल 2009

खोती हुई आवाज़ें


फुटबॉल इमारात का राष्ट्रीय खेल है। यहाँ के गर्म मौसम के कारण खेल का समय साल में कुछ दिन ही रहता है- सर्दियों के महीनों में। सर्दियाँ भी बिलकुल हल्की गुलाबी रौनक भरी दुपहरी वाली। इन दिनों आवासीय कॉलोनियों की हर सड़क पर फुटबॉल की ऐसी धूम रहती है जैसी भारत में क्रिकेट की। खेल की भी एक आवाज़ होती है.... विजय में डूबी उमंग की, जोश से भरे उत्साह की, कारों के भयभीत हॉर्न की, खिड़की के बिखरते काँच की, बच्चों पर बरसती फटकार की। ये आवाज़ें बड़ी लुभावनी होती हैं और पूरे मुहल्ले को अपने रंग से भर देती हैं।

मई के आरंभ तक यहाँ सर्दियों का अंत हो जाता है। यानी दिन सुनसान होने लगते है। पिछले दस सालों में इमारात की संस्कृति में तेज़ी से बदलाव आया है। लगभग पूरा दुबई काँच की गगनचुंबी इमारतों में परिवर्तित हो गया है। पुराने मुहल्ले या तो ख़त्म हो गए हैं या ख़त्म होने की कगार पर हैं। इनके स्थान पर काँच की दीवारों वाली बहुमंज़िली इमारतें आ गई हैं। जो मुहल्ले बच गए हैं, उनमें रहने की अलग शैली है। इनके आलीशान घरों में रहने वाले आभिजात्य बच्चे सड़कों पर नहीं खेलते। वे फुटबॉल के लिए बनाए गए विशेष मैदानों पर खेलते हैं। विशेष मैदान होना अच्छी बात है, पर विकास के साथ हम बहुत सी दिलकश आवाज़ों को भी खो रहे हैं जो भविष्य में कभी कहीं सुनाई नहीं देंगी। सड़कों पर खेलते हुए बच्चों की आवाज़ें भी उनमें से एक हैं।

6 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

waakayi aapne sahi kaha hai ....bahut kuchh kho rahe hain hum sab ...is vikas ke sath

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

vakt ki nabj ko dekhte huye aapne jo prashn uthaayaa hai vah galat nahin hai, aaj bhi ameer aur gareeb ke beech paison ki deewaar khadi hai aaj jahaan jahyaan sampannta hai wahaan gareebon ki upeksha aam baat hai.
ham apni puraani sanskriti bhoolte ja rahe hai, hame se dheere dheere, maanveeyta aue samvednaayen shoony ki or agrsar hain. shaayad iska hal nikalna asambhav ho ?
- vijay

श्यामल सुमन ने कहा…

हर विकास के नाम पर क्या होता है आज।
सबकी कोशिश से बचे खोती जो आवाज।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

creativekona ने कहा…

खेल की भी एक आवाज़ होती है.... विजय में डूबी उमंग की, जोश से भरे उत्साह की, कारों के भयभीत हॉर्न की, खिड़की के बिखरते काँच की, बच्चों पर बरसती फटकार की। ये आवाज़ें बड़ी लुभावनी होती हैं और पूरे मुहल्ले को अपने रंग से भर देती हैं।

पूर्णिमा जी ,
ये वाक्य बहुत बढ़िया लगा ...खेल की भी आवाज होती है......लोग झरनों ,बादलों,हवा,पानी पक्षी ..सभी की आवाजों के बारे में लिखते रहे हैं...पर खेल की आवाज...अद्भुत कल्पना ....
हेमंत कुमार

bhawna ने कहा…

vikaas tabhi achha lagta hai jab humari jade salamat rahein ,hamari ajaadi salamat rahe . aisa vikaas kis kaam ka jisme hum chirparichit avaajein aur umange dhoondhte fire

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

चेतावनी बहुत सही ढंग से
और
सही समय पर दी गई है!