इस बार लखनऊ गई तो पिताजी ने दादा जी का यह प्रमाण पत्र मुझे दिया। कागज पुराना होकर खराब हो गया है मगर इबारत साफ है। इस प्रमाण पत्र में दर्ज है कि उन्होंने हाई स्कूल में हिंदी में विशेष योग्यता प्राप्त की थी। बाद में वे एम.बी.बी.एस. डाक्टर बने। दादी बड़े गर्व से बतातीं कि २७ साल की आयु में उन्होंने बिना फेल हुए एम.बी.बी.एस. की डिग्री प्राप्त की थी।
"एम.बी.बी.एस में तो सब अच्छे पढ़ने वाले ही विद्यार्थी चुनकर लिये जाते हैं फेल तो कोई नहीं होता।" मैंने दादी से कहा था।
दादी ने बताया उस समय प्रवेश परीक्षा का नियम नहीं था। जिसके पास भी डाक्टरी के पढ़ाई के लायक पैसे होते वह प्रवेश ले लेता और फेल हो-होकर आगे बढ़ता रहता। वे परिवार में दादाजी के समवयस्क अन्य सदस्यों को गिनातीं देखो वे १४ साल में डाक्टरी पास हुए और वे १० साल में इंजीनियरिंग। उस समय डाक्टर और इंजीनियर परिवारों में बहुत कम हुआ करते थे। पढ़ने लिखने का शौक, योग्यता और साधन कम थे। घरों और सड़कों पर बिजली नहीं होती थी। आज जबकि कि घर-घर पढ़े लिखे ऊँची डिग्रियों वाले लोग होते हैं बहुत ही कम लोग हिंदी पढ़ने और उसमें विशेष योग्यता पाने की ओर अपना ध्यान रखते हैं। मुझे अनायास अपने दादा जी पर गर्व हो आता है कि उन्होंने पराधीन भारत में भी अपनी भाषा सीखने की ओर इतना ध्यान दिया।
ctrl + दबाकर चित्र को बड़ा कर के देखा जा सकता है।
चोंच में आकाश
पूर्णिमा वर्मन की विविध रचनाओं का संग्रह
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
सोमवार, 22 अगस्त 2011
जन्मदिन अभिव्यक्ति का- उपहार पाठकों के लिये
१५ अगस्त २०११ को अभिव्यक्ति अपने जीवन के ११ वर्ष पूरे कर १२वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। हर साल अभिव्यक्ति के जन्मदिन पर पाठकों के लिये एक विशेष उपहार की परंपरा रही है। इस वर्ष हमारी तकनीकी टीम ने दिन रात परिश्रम कर के तैयार किया है- तुक-कोश। एक लाख से अधिक शब्दों वाले इस तुक कोश में किसी भी शब्द से मिलते तुकांत शब्दों की खोज की जा सकती है।
गीति काव्य की हमारे देश में अद्भुत परंपरा है। लेकिन अनेक कारणों से जन सामान्य में इसकी लोकप्रियता उतनी नहीं रही जितनी होनी चाहिये। इन कारणों में से एक प्रमुख कारण यह भी है कि हिंदी में कोई अच्छा तुक कोश नहीं बना। देश की पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण के क्रम में, इस कमी को पूरा करने के लिये वेब पर पहली बार अपनी तकनीकी टीम के सहयोग से हम प्रस्तुत कर रहे हैं
अभिव्यक्ति तुक कोश
इस अवसर पर मैं संपादक मंडल की ओर से अपनी तकनीकी टीम और उसका नेतृत्व करनेवाली रश्मि आशीष को धन्यवाद देना चाहूँगी जिन्होंने इसे नियत समय में अथक उत्साह से तैयार किया। हमारे पाठकों का भी हार्दिक आभार जो निरंतर हमें कुछ नया करने की प्रेरणा देते रहे हैं। आशा है उदीयमान रचनाकार, कवि और लेखक इसे उपयोगी पाएँगे। सभी से निवेदन है के इसके अच्छे बुरे पक्ष को हमसे साझा करें ताकि इसे और भी उपयोगी बनाया जा सके।
केवल गीत ही नहीं गद्य में भी अनेक स्थानों पर तुक का प्रयोग कथन में चमत्कार पैदा करता है। तुकांतता की इस अद्भुत शक्ति को बल देने के लिये, जन जन तक पहुँचाने के लिये और अपनी सांस्कृतिक परंपरा के विकास को सहज सरल बनाने के लिये यह तुक कोश सहायक
हो यही मंगल कामना है।सोमवार, 4 जुलाई 2011
कूड़ेदानों पर हिंदी -
वाह ! हिंदी में ? मेरी पहली प्रतिक्रिया यही हुई थी इन नए डिब्बों को देखकर कर। कहना न होगा कि भाषा की लोकप्रियता और आवश्यकता बोलने और प्रयोग करने वालों की संख्या पर निर्भर होती है न कि सरकारी नियमों, देश या स्थान पर। यदि सरकार को पता चले कि जनता की भाषा बोले बिना काम नहीं चलेगा तो वे जनता की भाषा बोलने से परहेज नहीं करेंगे। इमारात में लगे नए कूड़ेदान भी इसे सिद्ध करते हैं।
ऐसे कूड़ेदान मैंने हवाईअड्डों पर विदेशों में काफी देखे हैं पर कभी ध्यान नहीं गया कि उन पर हिंदी में लिखा गया है या नहीं। मुझे लगता है कि उन पर हिंदी नहीं थी वर्ना ध्यान आकर्षित जरूर होता। इमारात की सरकार जानती है कि हिंदी लिखकर वे शहर को स्वच्छ बनाने में अधिक सफलता से काम कर सकते हैं। इसलिये इन कूड़ेदानों पर अरबी और अँगरेजी के साथ हिंदी में भी लिखवाया गया है। आप भी देखें... धूप बहुत तेज थी सो फोटो दूर से साये में खड़े होकर ली थी। इतनी साफ़ नहीं दिखती पर इसमें तीनों ख़ानों पर इस प्रकार लिखा है-
बाएँ से- हरे रंग में कागज, अखबार और कार्डबोर्ड, नीले में- बोतल डिब्बे और प्लास्टिक तथा लाल रंग में- अन्य सभी कूड़े। आप भी फोटो क्लिक कर के देखें। यहाँ लिखा हुआ देखकर समझना आसान हो जाएगा। दुबार फिर उधर गई तो एक साफ़ फोटो लेकर इसे बदल दूँगी।
यहाँ यह भी याद रखना आवश्यक कि भाषाई साम्राज्यवाद के चलते रईस देश गरीब देशों की जनता की भाषा को ही बदल देने पर जी जान से जुटे पड़े हैं। पर सोचना हमें है कि हम अपनी अस्मिता को मरने देते हैं या उसके लिये जी जान से जुटकर उसे ताकतवर बनाते हैं ताकि वह स्वस्थ होकर दुनिया से मुकाबला कर सके।
आप भी कहेंगे कूड़ेदान पर हिंदी देखकर इतना खुश हो जाने की भला क्या बात... हा हा सही हैं लेकिन जब हिंदुस्तान से हिंदी लुप्त हो रही है, जब हमें दिल्ली हवाई अड्डे पर एक भी किताब या पत्रिका हिंदी में दिखाई नहीं देती, जब क्नाटप्लेस पर खड़े होकर एक भी दूकान का नाम हिंदी में लिखा नजर नहीं आता और हमें भारत पहुँचकर ऐसा महसूस होता है कि हम इंगलैंड में खड़े हैं ऐसे वातावरण में विदेशों में हिंदी देखना, निश्चय ही, कुछ विशेष तो है।
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