अभिव्यक्ति और अनुभूति के नवीनतम अंक होली विशेषांक हैं। इनमें पिछले सभी सालों की होली रचनाओं का समावेश किया गया है। नई रचनाओं चिट्ठों की दुनिया के कुछ विशेष हस्ताक्षर भी हैं जो आशा है आपको भी लुभाएँगे, तो प्रस्तुत है- प्रस्तुत है नए अंक राजीव तनेजा की कहानी आसमान से गिरा, अविनाश वाचस्पति का व्यंग्य शेयरों की लगी वाट और क्रिकेटरों के हो गए ठाठ, नर्मदा प्रसाद उपाध्याय का ललित निबंध 'माधव और माधव', प्रो. अश्विनी केशरवानी का साहित्यिक निबंध 'लोकगीतों में देवी-देवताओं की होली', फ़िल्म इल्म में यूनुस ख़ान का आलेख 'फ़िल्मी गानों में होली' और घर परिवार में अरुणा घवाना ठाकुर के सुझाव होली के लिए प्राकृतिक रंगों की खोज के विषय में। साथ ही सप्ताह का विचार, क्या आप जानते हैं और कलम गही नहीं हाथ।
अनुभूति के होली विशेषांक में बिलकुल ताज़े, कल रात ही लिखे गए मेरे कुछ नए दोहे, साथ में ढेरों नई रचनाएँ जो पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुईं। राजेंद्र गौतम और सुनीतो चोटिया के दोहे, अशोक कुमार वशिष्ठ, संतोष कुमार सिंह, रामेश्वर दयाल कांबोज 'हिमांशु’, पारुल चाँद पुखराज, महेंद्र भटनागर, डॉ० तारादत्त 'निर्विरोध, डॉ. अशोक आनन 'गुलशन' के गीत, गुरमीत बेदी, स्वाती भालोटिया, रजनी भार्गव, उमा मालवीय की मुक्त छंद कविताएँ, भुवनेश कुमार और तरुण जोशी की व्यंग्य तरंग, अरुण मित्तल का कवित्त, सतीश चंद्र उपाध्याय का पद और अरविंद चौहान के हाइकु।
Monday, March 17, 2008
अभिव्यक्ति - अनुभूति १७ मार्च २००८
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पूर्णिमा वर्मन
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Thursday, January 31, 2008
उदासियों के पत्ते

वसंत के तिकड़ी गीतों के क्रम में आज हाज़िर है दूसरा गीत। शायद इस रूप में यह गीत नहीं सिर्फ कविता है...इसे लेकर हीरा चड्ढा के पास गई थी। वे आकाशवाणी इलाहाबाद में प्रोग्राम एग्ज़िक्यूटिव थीं। नए लिखने वालों को सिखाना समझाना बड़े प्यार से करतीं। हमारी रचनाएँ प्रसारित तो करती ही थीं। गीत देखकर बोलीं, "पूर्णिमा तुम्हारा यह गीत तो अच्छा है पर जैसे जैसे आगे बढ़ता गया है अपने छंद से भटकता गया है।" उस समय मुझे लगा कि यह ऐसे ही ठीक है पर अब समझती हूँ कि उन्होंने क्या कहा था। बहुत सी बातें बहुत देर में समझ आती हैं। अगर यह अगले कविता संग्रह में शामिल हुआ तो सुधार दूँगी। हीरा दीदी आज इस दुनिया में नहीं हैं पर उनकी याद सदा रहेगी। उनके साथ ही याद आ रहे हैं निर्मला ठाकुर और विजय बोस जिन्होंने स्क्रिप्ट पढ़ना सिखाया। शांति मेहरोत्रा, विपिन शर्मा, आशा ब्राउन...प्यारे इलाहाबाद के प्यारे दिन...
फिर हरे कर दिये वसंत ने
उदासियों के पत्ते
पीली धूप खिंची खिंची सी
खड़ी रही देहरी पर
भीतर आए तो कैसे
लगे भौंकने आंगन में
एकाकीपन के कुत्ते
फिर हरे कर दिये वसंत ने
उदासियों के पत्ते
सूरज के सात घोड़ों वाला रथ
आया ही नहीं
अभी तलक सोया है सारथी
मुँह ढक कर
घरवाली उषा की उनींदी आँखें
न जगाती हैं सारथी को
न देखती हैं देहरी पर
कैसे होगी सुबह?
अरे, कोई है? कोई है?
बाहर से चिल्लाता है वसंत
लॉन में खिलखिलाती है पीली सरसों
अब यहाँ कोई नहीं
कहीं और चले गये
खुशियों के जत्थे
फिर हरे कर दिये वसंत ने
उदासियों के पत्ते !
आज न फूल हैं न तितलियाँ न पतंगे
न रंग न झरने न गीत
चिड़ियां भी तो आती नहीं
कभी हमीं फूल थे हम ही तितली
हमीं पतंगें, रंग और झरने
हमीं गुनगुनाते थे चिड़ियों से यहाँ-वहाँ
अब तो सिर्फ
दिन बीतते हैं
धीरे धीरे
चुपचाप खिड़की में से
हिला हिला कर हाथ
बुलाता है अमलतास
चुप हैं दीवारों पर टेसू के ठप्पे
फिर हरे कर दिये वसंत ने
उदासियों के पत्ते।
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पूर्णिमा वर्मन
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12:45 PM
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Tuesday, January 29, 2008
आवारा वसंत

पिछले दो दिनों से सर्दी की कड़की कम है, पंचांग कहता है कि वसंत पंचमी 11 फ़रवरी को है, यानी समय आगया वसंत की कविताओं की खोज का। पुरानी फ़ाइलें पलटती हूँ... मार्च 1979 की 3 कविताएँ हैं वसंत पर। बदलते मौसम और उनसे जुड़े पर्व जीवन में उल्लास भरते हैं लेकिन इनमें थोड़ी उदासी है। लगभग 30 वर्ष पुरानी इन तीन कविताओं में से एक आज पोस्ट कर रही हूँ। इसमें 'तरह' शब्द की वर्तनी को बदल कर 'तरहा' किया गया है। दरअसल कविता जब दिमाग में उपजी तो उसी उच्चारण के साथ जन्मी थी। लगा कि पाठक तक वह बात पहुँचनी चाहिए। बोलते समय हम भी कभी कभी 'तरह' को 'तरहा' कहते हैं। कहते हैं ना? कोशिश करूँगी कि बाकी दो कविताएँ भी वसंत के जाने से पहले यहाँ रख सकूँ।
हाँ अनुभूति का 11 फ़रवरी का अंक वसंत विशेषांक होगा। आप सभी की वसंत कविताओं का स्वागत है। वसंत का कोई भी रंग हो चलेगा, बस कविता 31 जनवरी की रात 12 बजे तक ज़रूर भेज दें पता है teamanu(at)anubhuti-hindi.org. आप फ़िलहाल आवारा वसंत का आनंद लें...मैं आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा में हूँ।
अबकी साल
वसंत यों ही आवारा घूमा
मेरी तरहा
कमरे से बगिया तक
बगिया से चौके में
चौके की खिड़की से
चमकीली नदिया तक
पटरी पटरी
दूर बहुत शिव की बटिया तक
मेरे ही संग ठोकर ठोकर रक्त रंगे ढाक के पावों
मौसम भी बंजारा घूमा
मेरी तरहा।
अबकी साल
वसंत यों ही आवारा घूमा
मेरी तरहा
पटरी से पर्वत तक
पर्वत से मंदिर में
अष्टभुजा घाटी से
संतों की कुटिया तक
सीढ़ी सीढ़ी
धुआँ धुआँ सीली आँखों में
पथ पर खुदे हुए नामों से मन के मिटे हुए नामों तक
हर इक पल रतनारा घूमा
मेरी तरहा
अबकी साल
वसंत यों ही आवारा घूमा
मेरी तरहा
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पूर्णिमा वर्मन
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10:03 AM
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