बुधवार, 8 अप्रैल 2009

आवजो... फिर आना


खाना जीवन की पहली ज़रूरत तो है ही, विलासिता में भी यह पहले स्थान पर है। एक समय था जब थाली वाले होटल आम-आदमी के भोजन की सस्ती जगह समझे जाते थे। आज यह सस्ती थाली नाज़ो-नखरे के साथ, विभिन्न देशों के अनेक होटलों और रेस्त्राओं से सजे दुबई में लोकप्रियता के रेकार्ड बना रही है। पिछले साल यहाँ खुले 'राजधानी' नाम के रेस्त्रां के सामने लगी भीड़ से ऐसा लगता है जैसे खाना यहाँ मुफ़्त बँट रहा है। ऐसी भीड़ थाली वाले रेस्त्रां में मैंने पहले पूना के श्रेयस में देखी थी। पर वहाँ के भोजन में मराठी अंदाज़ हैं और यहाँ इस रेस्त्रां के गुजराती। पतली कार्निस पर रखी लकड़ी की धन्नियों वाली छत से सजे इस रेस्त्रां की आंतरिक सज्जा में पारंपरिक सौंदर्य भरने का सुरुचिपूर्ण प्रयत्न किया गया है।

भारत में पहले ही 'राजधानी थाली' नाम से ३४ रेस्त्रां चलाने वाली इस भोजन शृंखला का यह पहला विदेशी उपक्रम था। अभी तक भारत में इसकी शाखाओं की संख्या ३८ हो चुकी है। इस बीच राजधानी थाली सिडनी और वियतनाम में भी यह अपने पाँव जमा चुकी है। ६० साल से अधिक पुराने इस पारंपरिक रेस्त्रां की पहली शाखा १९४७ में मुंबई के क्रॉफ़र्ड मार्केट में खुली थी।

खाने के पहले और बाद ताँबे के तसले में अरबी जग से हाथ धुलवाने की ऐसी परंपरा शायद दुबई के किसी अन्य रेस्त्रां में नहीं। धुएँ का छौंक लगी लस्सी लाजवाब है और अगर २८ व्यंजनों वाली थाली का खाना खाकर दिल खुश हो जाए तो आप रेस्त्रां में टंगी थाली को वहीं रखी छड़ीनुमा हथौड़ी से बजा सकते हैं। थाली की झंकार सुनते ही वेटरों का समवेत स्वर गूँजता है- आवजो यानी फिर आना और प्रवासी की आँखें गीली गीली।

7 टिप्‍पणियां:

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" ने कहा…

आदरणीया पूर्णिमा जी
"आओजो... फिर आना " पढ़कर अच्छा लगा की वहाँ भी भारतीय व्यंजनों ने धूम मचा रखी है.
हमारे जबलपुर में भी ' पंचवटी ' ग्रुप है. उसकी भी पूरे इंडिया में बहुत सी ब्रान्चेस हैं
और आपने सच ही कहा है कि वहाँ २८ तरह के व्यंजनों से भरी थाली होती है.
सच हम लोग अक्सर वही जाते हैं, मेरी पत्नी को बेहद पसंद है ये थाली वाला खाना .
जानकारी के लिए शुक्रिया.
- विजय

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

पूर्णिमा जी ,
गुजराती थाली मुझे भी बहुत प्रिय है -अक्सर कुछ ज्यादा ही खा लेते हैँ ऐसे रस्त्राँ मेँ -
एक और बात - " आओजो " नहीँ " आवजो " कहते हैँ गुजराती मेँ :) माने " फिर आइयेगा (मिलने )
- लावण्या

डॉ .अनुराग ने कहा…

दिलचस्प .....खिड़की सी खोली है एक देश की....

पूर्णिमा वर्मन ने कहा…

धन्याद लावण्या, इसको ठीक कर दिया है। सुनने में यह आओजो जैसा ही लगता है न? इसी से गलती हो गई।

creativekona ने कहा…

पूर्णिमा जी ,
आप के ब्लॉग के माध्यम से तो वहां की काफी नयी जानकारियां मिलती रहती हैं .
आपका बताने या कहने का ढंग भी बहुत अच्छा है.
हेमंत कुमार

neha shefali ने कहा…

आदरणीय पूर्णिमा मैम,
आपका लेख पढ़ा......बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक है.......भारत में बैठ के दुबई से रूबरू होना काफी अच्चा लगा......मैने अपनी एक कहानी झरोखा पर प्रकाशित की है.......आपके बहुमूल्य सुझाव उसपर आमंत्रित हैं .....
नेहा शेफाली

milind tikhe ने कहा…

Mavalli Tiffin Room(MTR),Bangaluru,
men mashhoor lalbaugh garden men ek tilay per sthit hai.Wahanki lambi-lambi qataron ko dekhkar aisa lagata hai jaise yeh sarelog
parva-rohan/pahadi chadhdhne ke liye wahan upasthit hain aur chadhdhne ka kam kar rahe hain.
MTR ne karama-dubai men ek restaurant khola tha jo pata nahi
kyun band ho gaya.Receipe yukt MTR food packets uae ke bade-bade super markets men upalabdh hain.