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सोमवार, 4 जुलाई 2011

कूड़ेदानों पर हिंदी -

वाह ! हिंदी में ? मेरी पहली प्रतिक्रिया यही हुई थी इन नए डिब्बों को देखकर कर। कहना न होगा कि भाषा की लोकप्रियता और आवश्यकता बोलने और प्रयोग करने वालों की संख्या पर निर्भर होती है न कि सरकारी नियमों, देश या स्थान पर। यदि सरकार को पता चले कि जनता की भाषा बोले बिना काम नहीं चलेगा तो वे जनता की भाषा बोलने से परहेज नहीं करेंगे। इमारात में लगे नए कूड़ेदान भी इसे सिद्ध करते हैं।

ऐसे कूड़ेदान मैंने हवाईअड्डों पर विदेशों में काफी देखे हैं पर कभी ध्यान नहीं गया कि उन पर हिंदी में लिखा गया है या नहीं। मुझे लगता है कि उन पर हिंदी नहीं थी वर्ना ध्यान आकर्षित जरूर होता। इमारात की सरकार जानती है कि हिंदी लिखकर वे शहर को स्वच्छ बनाने में अधिक सफलता से काम कर सकते हैं। इसलिये इन कूड़ेदानों पर अरबी और अँगरेजी के साथ हिंदी में भी लिखवाया गया है। आप भी देखें... धूप बहुत तेज थी सो फोटो दूर से साये में खड़े होकर ली थी। इतनी साफ़ नहीं दिखती पर इसमें तीनों ख़ानों पर इस प्रकार लिखा है-
बाएँ से- हरे रंग में कागज, अखबार और कार्डबोर्ड, नीले में- बोतल डिब्बे और प्लास्टिक तथा लाल रंग में- अन्य सभी कूड़े। आप भी फोटो क्लिक कर के देखें। यहाँ लिखा हुआ देखकर समझना आसान हो जाएगा। दुबार फिर उधर गई तो एक साफ़ फोटो लेकर इसे बदल दूँगी।

यहाँ यह भी याद रखना आवश्यक कि भाषाई साम्राज्यवाद के चलते रईस देश गरीब देशों की जनता की भाषा को ही बदल देने पर जी जान से जुटे पड़े हैं। पर सोचना हमें है कि हम अपनी अस्मिता को मरने देते हैं या उसके लिये जी जान से जुटकर उसे ताकतवर बनाते हैं ताकि वह स्वस्थ होकर दुनिया से मुकाबला कर सके।

आप भी कहेंगे कूड़ेदान पर हिंदी देखकर इतना खुश हो जाने की भला क्या बात... हा हा सही हैं लेकिन जब हिंदुस्तान से हिंदी लुप्त हो रही है, जब हमें दिल्ली हवाई अड्डे पर एक भी किताब या पत्रिका हिंदी में दिखाई नहीं देती, जब क्नाटप्लेस पर खड़े होकर एक भी दूकान का नाम हिंदी में लिखा नजर नहीं आता और हमें भारत पहुँचकर ऐसा महसूस होता है कि हम इंगलैंड में खड़े हैं ऐसे वातावरण में विदेशों में हिंदी देखना, निश्चय ही, कुछ विशेष तो है।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2007

तारों की चूनर


आज का दिन अच्छा रहा। आज के ही दिन डॉ सत्यभूषण वर्मा का जन्म हुआ था 1932 में, वे हिन्दी हाइकु के पितामह माने जाते हैं। उनके सम्मान में हिंदी हाइकु की दुनिया के लोग 4 दिसंबर को हिंदी हाइकु दिवस मनाते हैं। आज गाज़ियाबाद में इसी अवसर पर एक समारोह आयोजित किया गया और मेरी सहेली डॉ.भावना कुंअर के पहले हाइकु संग्रह का विमोचन भी हुआ।

भावना भारत में नहीं थीं। वे पिछले कई सालों से यूगांडा में हैं। अभी अभी एक मित्र के हाथों उन्हें प्रकाशित किताब की 5प्रतियाँ मिली हैं। उनसे मैसेंजर बात हुई, खूब खुश थीं। बिलकुल अभी किताब के साथ खिंचवाया हुआ एक फ़ोटो भेजा उन्होंने। इस संग्रह की भूमिका लिखी है प्रसिद्ध हाइकुकार डॉ. जगदीश व्योम ने और भावना का परिचय मेरा लिखा हुआ है। वे पिछले कुछ सालों से अनुभूति के लिए नियमित लिखती रही हैं।

किताब बहुत सुंदर प्रकाशित हुई है। नाम है तारों की चूनर। हर पृष्ठ पर एक हाइकु और एक सुंदर स्केच है। मुखपृष्ठ पर का चित्र स्वयं भावना की कलाकृति है और अंदर के हाइकुओं पर आधारित चित्र जाने माने चित्रकार बी.लाल के हैं। इतनी कलात्मक पुस्तक के लिए भावना को ढेर सी बधाई और संग्रह की सफलता के लिए अनेक शुभकामनाएँ :)