मंगलवार, 31 जनवरी 2012

एक पुराना प्रमाण पत्र जो आज भी प्रेरित करता है

इस बार लखनऊ गई तो पिताजी ने दादा जी का यह प्रमाण पत्र मुझे दिया। कागज पुराना होकर खराब हो गया है मगर इबारत साफ है। इस प्रमाण पत्र में दर्ज है कि उन्होंने हाई स्कूल में हिंदी में विशेष योग्यता प्राप्त की थी। बाद में वे एम.बी.बी.एस. डाक्टर बने। दादी बड़े गर्व से बतातीं कि २७ साल की आयु में उन्होंने बिना फेल हुए एम.बी.बी.एस. की डिग्री प्राप्त की थी।
"एम.बी.बी.एस में तो सब अच्छे पढ़ने वाले ही विद्यार्थी चुनकर लिये जाते हैं फेल तो कोई नहीं होता।" मैंने दादी से कहा था।
दादी ने बताया उस समय प्रवेश परीक्षा का नियम नहीं था। जिसके पास भी डाक्टरी के पढ़ाई के लायक पैसे होते वह प्रवेश ले लेता और फेल हो-होकर आगे बढ़ता रहता। वे परिवार में दादाजी के समवयस्क अन्य सदस्यों को गिनातीं देखो वे १४ साल में डाक्टरी पास हुए और वे १० साल में इंजीनियरिंग। उस समय डाक्टर और इंजीनियर परिवारों में बहुत कम हुआ करते थे। पढ़ने लिखने का शौक, योग्यता और साधन कम थे। घरों और सड़कों पर बिजली नहीं होती थी। आज जबकि कि घर-घर पढ़े लिखे ऊँची डिग्रियों वाले लोग होते हैं बहुत ही कम लोग हिंदी पढ़ने और उसमें विशेष योग्यता पाने की ओर अपना ध्यान रखते हैं। मुझे अनायास अपने दादा जी पर गर्व हो आता है कि उन्होंने पराधीन भारत में भी अपनी भाषा सीखने की ओर इतना ध्यान दिया।

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9 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रोचक, अपनों का लगाव हम सबके ऐसे ही आकर्षित करता रहे।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

कुछ प्रमाण पत्र प्रेरित करते है तो कुछ छुपाने के लिए होते है। मेरे पास आज भी एक प्रमाण पत्र सुरक्षित है जिसमें मैं हिंदी में फेल हो गया था :)

vidha-vividha ने कहा…

अपनों का परिश्रम, सफलताये हमें और भी प्रेरित करती है आगे बढ़ने को .आपकी पोस्ट से हमें अपने गाँव की एक बात याद आ गई- हमारे दादाजी के दोस्त ने ७ साल में एल. एल. बी. किया था तो वे अशिक्षित गाँव वालो को समझाते थे कि देखो उसने सिर्फ ३ साल वकिली कि पढाई कि है और मैंने ७ साल अब तुम ही बताओ बड़ा वकील कौन होगा.

आशा जोगळेकर ने कहा…

आपके दादाजी की कथा काफी रोचक है ।

प्रदीप कांत ने कहा…

रोचक है - मज़ा आया।

expression ने कहा…

संजो कर रखिये...................

जाने क्या क्या छिपा होता है बुजुर्गों से जुड़ी चीज़ों में..........

सस्नेह
अनु

ePandit ने कहा…

सही कहा, कोई जमाना था डॉक्टरी और इंजीनियरिंग के जलवे थे। डॉक्टरी के तो खैर अब भी कम नहीं।

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत अच्छा लगा यह प्रमाण पत्र देखकर।

ramji mishra ने कहा…

उत्तर प्रदेश के लेखकों को निस्वार्थ हिंदी साहित्य सेवा करते देखकर छाती फूलती है गर्व से जय हिंदी जय हिन्द.......