गुरुवार, 22 जनवरी 2009

वसंत भीड़ में

वसंत की तीसरी कविता जो पिछले साल दूसरी व्यस्तताओं के चलते रह गई, इस बार वसंत बीतने से पहले प्रस्तुत है-
हरी घास पर
गदबदी टाँगों से कुलाचें भरता
कोयल सा कुहुकता
भँवरे सा ठुमकता
फूलों के गुब्बारे हाथों में थामे
अचानक गुम हो गया वसंत
मौसमों की भीड़ में बेहाल परेशान
बिछड़ा नन्हा बच्चा
जैसे मेले की भीड़ में खो जाए माँ

मौसम तो सिर्फ छह थे
जाने पहचाने
लेकिन भीड़ के नए मौसम
वसंत बेचारा क्या जाने
चुनाव का मौसम
आतंकवादियों का मौसम
भूकंप का मौसम
पहाड़ गिरने का मौसम
बाढ़ का मौसम, सूखे का मौसम
नेताओं के आने का मौसम
बड़े बड़े शिखर सम्मेलनों का मौसम
फ़िल्म उत्सवों का मौसम
फ़ैशन परेडों का मौसम
गालियों का मौसम, पुरस्कारों का मौसम
गरीबी का मौसम, नारों का मौसम, औज़ारों का मौसम
विस्फोटों का मौसम, हथियारों का मौसम

वसंत
नन्हा दो माह का बच्चा
इस भीड़ में गुम न होता तो क्या होता?

11 टिप्‍पणियां:

राधिका बुधकर ने कहा…

बढ़िया लिखा हैं आपने ,

प्रभाकर पाण्डेय ने कहा…

गालियों का मौसम, पुरस्कारों का मौसम
गरीबी का मौसम, नारों का मौसम, औज़ारों का मौसम
विस्फोटों का मौसम, हथियारों का मौसम।

य़थार्थ प्रस्तुति। धन्यवाद।

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

मौ सम

कौन

संत

कह रहा

वसंत।

शोभा ने कहा…

मौसम तो सिर्फ छे थे
जाने पहचाने
लेकिन भीड़ के नए मौसम
वसंत बेचारा क्या जाने
चुनाव का मौसम
आतंकवादियों का मौसम
भूकंप का मौसम
पहाड़ गिरने का मौसम
बाढ़ का मौसम, सूखे का मौसम
नेताओं के आने का मौसम
बड़े बड़े शिखर सम्मेलनों का मौसम
फ़िल्म उत्सवों का मौसम
फ़ैशन परेडों का मौसम
गालियों का मौसम, पुरस्कारों का मौसम
गरीबी का मौसम, नारों का मौसम, औज़ारों का मौसम
विस्फोटों का मौसम, हथियारों का मौसम
सुन्दर अभिव्यक्ति।

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर रचना.

पवन *चंदन* ने कहा…

नहीं होगा गुम ये नन्‍हा शिशु
जब तक इसकी देखरेख आप जैसों के सानिध्‍य में हैं।
हम भी इसको ढूंढ़ ही लेंगे
भले ही हमें निकलना पड़े कितनी ही रक्‍तरंजित परिस्थितियों से
वसंत पंचमी की हार्दिक बधाई

munita ने कहा…

हां
समर्थन
आज की परिस्थिति के हिसाब से ठीक है,
संवेदनशील रचना है, रचनाकार भी।
मेरे विचार से।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

बहुत ही उम्दा लिखा। आज के संदर्भ में।

creativekona ने कहा…

Poornima ji,
yah sanyog hee hai ki main apkee kavita Vasant Bheed Men vasant ke theek 2 din pahale padh raha hoon.
apne bilkul thhek likha hai,aj kee bhautikta kee andhee daud,badhte atankvad,aur samaj ke badalte paridrishya men vasant ke bare men sochne,ise ek utsav ke roop men manane ka logon ko khayal hee naheen.vasant vakayee bheed men kho gaya hai.
mujhe yad hai pahle vasant vale din ghar ke sabhee log peele kapde pahante the,sarasvatee poojan hota tha, ghar men pakvan bante the.
aksar daraganj men Dr Jagdeesh Gupta ji keghar,ya sahitya smmelan men kavi goshthee hotee thee.
is bar koshish kar raha hoon basant ke avasar par Alld rahoon.
Apko vasant poornima,Nirala jayantee kee hardik shubhkamnayen.
Hemant Kumar

Pratap ने कहा…

वसंत बेचारा क्या जाने
चुनाव का मौसम
आतंकवादियों का मौसम
भूकंप का मौसम
पहाड़ गिरने का मौसम
बाढ़ का मौसम, सूखे का मौसम
नेताओं के आने का मौसम
बड़े बड़े शिखर सम्मेलनों का मौसम
फ़िल्म उत्सवों का मौसम
फ़ैशन परेडों का मौसम
गालियों का मौसम, पुरस्कारों का मौसम
गरीबी का मौसम, नारों का मौसम, औज़ारों का मौसम
विस्फोटों का मौसम, हथियारों का मौसम
बहुत ही अच्छी लगी यह कविता

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" ने कहा…

पूर्णिमा जी
सुंदर रचना है >>>.
कोयल सा कुहुकता
भँवरे सा ठुमकता
फूलों के गुब्बारे हाथों में थामे
अचानक गुम हो गया वसंत...
- विजय