सोमवार, 24 अगस्त 2009

दादा विंसी के शेर का पुनर्जन्म


दादा विंसी को तो आप जानते ही होंगे, अरे वही अपने विंसी दा.... जिन्हें इतालवी भाषा में दा विंसी कहते हैं। हाँ हाँ वही जिन्होंने मोनालीसा और लास्ट सपर नाम के प्रसिद्ध चित्र बनाए हैं। यों तो वे गणितज्ञ, इंजीनियर, अन्वेषक बहुत कुछ थे पर उनके द्वारा बनाए गए कुछ खिलौने तकनीक और कला के अनुपम उदारण माने जाते हैं। इन्हीं में से एक था शेर, जो आकार में असली शेर के बराबर था, वह चलता था, मुँह खोलता था सिर को इधर उधर घुमाता था और दुम भी हिलाता था।

१४०० के युग में जब जब मानव का मशीनी ज्ञान इतना विकसित नहीं था यह खिलौना किसी आश्चर्य से कम न था। यह अद्भुत खिलौना वर्ष १५१५ में विंसी ने फ्लोरन्टाइन समाज की ओर से फ्रेंच नगर लियोन में फ्रांस के शासक फ्रांसिस प्रथम को फ्लोरेंस और फ्रांस के बीच हुए एक समझौते के अवसर पर भेंट किया था। कहते हैं कि इसके साथ एक मशीनी कोड़ा भी था। जब इस कोड़े से फ्रांसिस शेर को तीन बार मारता था तब शेर का सीना खुल जाता और फ्रांस राजशाही का प्रतीक चिह्न बाहर आ जाता। यह उपहार प्रतीकात्मक भी था। शेर फ्लोरेंस राजशाही का प्रतीक था और इस खिलौने के द्वारा यह प्रकट किया गया था कि फ्रांस फ़्लोरेंस के सीने में बसता है। १५१७ में राजा की शान में दिए गए शानदार प्रीतिभोज में इसे एक बार फिर देखा गया था।

समय के साथ यह चलने वाला लकड़ी का शेर कहाँ गुम गया इसकी विस्तृत जानकारी नहीं मिलती। लेकिन फ्रांस के एंबोइस नगर में स्थित क्लोस ल्यूस संग्रहालय में, विंसी के कार्यों पर आधारित, ३१ जनवरी २०१० तक चलने वाली एक लंबी और महत्त्वपूर्ण प्रदर्शनी के लिए, इसे रेनाटो बोरेटो नामक इंजीनियार ने फिर से बनाया है। रेनाटो के शेर में पुरानी घड़ियों की तरह चाभी भरी जाती है। पुनर्निर्माण में दा विंसी द्वारा लिखी हुई जानकारी और नक्शों की सहायता भी ली गई है। क्लोस ल्यूस संग्रहालय का विंसी से गहरा संबंध हैं। यह उनका निवास स्थान रहा है। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम तीन वर्ष यहीं बिताए थे। बाद में इसे संग्रहालय का रूप दे दिया गया। दा विंसी की अनुपस्थिति में उनके द्वारा विकसित तकनीक से बना यह शेर पुनर्जीवित होकर अपने दर्शकों के स्वागत के लिए तैयार है। अगर आप भी इसे देखना चाहें तो काम करता हुआ तकनीकी ढाँचा यहाँ और चलता हुआ खिलौना यहाँ देख सकते हैं।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

हाय गजब! कहीं तारा टूटा


तारों को ऊपरवाले ने होशियार हाथों से आसमान में चिपकाया है वे टूटते नहीं लेकिन जब टूटते हैं तो लोगों का दिल भी लूटते हैं। तारों का टूटना लोगों को कभी डराता है तो कभी आकर्षित करता है लेकिन खगोल-वैज्ञानिकों के लिए यह अध्ययन की वस्तु है। वे तारों के टूटने का समय पहले से जानकर उनके विषय में जानने के लिए तरह-तरह के उपकरणों से लैस होकर कर घंटों प्रतीक्षा करते हैं। ऐसा ही एक दिन था इमारात में विगत १२ अगस्त को जब लगभग १०० तारा-प्रेमी दुबई ऐस्ट्रोनॉमी ग्रुप के नेतृत्व में, आधी रात के बाद गहराते अंधेरे में तारों की बरसात देखने शहर से दूर रेगिस्तान के लिए निकले। शहर से दूर इसलिए कि दुबई की तेज़ रोशनी आकाश तक को इतना उजला बनाती है कि रात में भी तारे दिखाई नहीं देते।

रात एक बजे यह कारवाँ "दुबई हत्ता मार्ग" पर "मरगम" के शांत कोने में पहुँचा। अगस्त का महीना इमारात के लिए मौसम की दृष्टि से सुखद नहीं होता। बेहद गर्मी, उमस और हर समय रेत के तूफ़ान का डर- ऐसे में रेगिस्तान पर्यटकों और रेत-खेलों के शौकीनों के लिए भी बंद होता है, लेकिन आज का दिन विशेष था इसलिए सुरक्षा के विशेष प्रबंधों के साथ खगोल-वैज्ञानिकों और तारा-प्रेमियों का यह दल यहाँ आ पहुँचा। विशेष इसलिए कि सन २५८ के बाद से हर साल अगस्त के महीने में जब पृथ्वी पर्सियस के स्विफ़्ट ट्यूटल धूमकेतु की धूल के बादलों के बीच से गुज़रती है तब खुले काले आकाश में तारों की बरसात का अनोखा दृश्य देखने को मिलता है। हालाँकि तारों की बरसात जुलाई में शुरू हो चुकी थी लेकिन स्पष्ट दृश्य और साफ़ मौसम को ध्यान में रखते हुए १२ अगस्त के दिन का चुनाव किया गया। "मरगम" पहुँचते ही हवा कुछ चंचल हो उठी और ठहरे हुए धूल के कण जहाँ तहाँ समाने लगे पर आसमान शांत था और धीरे से उगते हुए चाँद ने सबको आकर्षित कर लिया। सदस्यों ने रेत पर अपने-अपने स्थान ग्रहण किए और टेलिस्कोप की नज़र आसमान की ओर मोड़ दी। दुबई ऐस्ट्रोनॉमी ग्रुप के अध्यक्ष हसन अहमद हरीरी ने तारों की अंतहीन दुनिया का परिचय दिया जबकि सबकी आँखें दूरबीन से नज़दीक खींचे गए आसमान पर टिकी रहीं।

अचानक एक तेज़ रोशनी चमकी और लकीर खींचती हुई गुम गई। आकाश पर आँखें गड़ाए लोगों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। फिर एक और रौशनी... फिर एक और... रुक रुक कर यह दृश्य बनता तो रहा लेकिन जिस तारों की बरसात का सपना लेकर लोग यहाँ पहुँचे थे वह लुका-छिपी ही खेलती रही, खुलकर सामने नहीं आई। समय बीतने लगा कुछ लोग १८० डिग्री दृश्य के लिए लेट गए। सहसा हल्की हवा शुरू हुई, शायद यह तेज़ हो जाने वाली थी। कुछ लोगों ने सुरक्षा की दृष्टि से कारों में चले जाना ठीक समझा पर कुछ सर्जिकल मास्क पहन मैदान में डटे रहे। धीरे-धीरे रेत, हवा और चाँदनी ने लोगों के आराम को छीनना शुरू किया तो गिने चुने बहादुरों को छोड़कर अधिकतर लोगों ने मैदान छोड़कर चले जाने में ही खैर समझी। कुल मिलाकर इस साल तारे तो टूटे पर हाय गज़ब! कहने को लोग तरसते ही रह गए। कोई बात नहीं अगस्त तो अगले साल फिर आनेवाला है। फ़िलहाल, आँखों देखे हाल के लिए प्रस्तुत है इस घटना का एक छोटा वीडियो टुकड़ा गल्फ़ न्यूज़ के सौजन्य से।

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ


स्वतंत्रता दिवस की अनेक शुभकामनाएँ! अमर रहे गणतंत्र हमारा! हमारी भाषा, साहित्य व संस्कृति का विकास हो और हम दुनिया में ऐसे काम कर जाएँ जिससे अपनी पारंपरिक संस्कृति के साथ-साथ वर्तमान उन्नति पर भी गर्व कर सकें। इस स्वतंत्रता दिवस पर इसी संकल्प के साथ आगे बढ़ने की ढेर सी शुभकामनाएँ एक बार फिर!

स्वतंत्रता दिवस के साथ ही आती है अभिव्यक्ति की वर्षगाँठ! आज अभिव्यक्ति अपने कार्य काल के नौ वर्ष पूरे कर दसवें वर्ष में कदम रख रही है। १५ अगस्त २००० को इसका पहला अंक मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित हुआ था। १ जनवरी २००१ से यह पाक्षिक बनी। १ मई २००२ से यह माह में चार बार १-९-१६ और २४ तारीख को प्रकाशित होने लगी। लंबे समय तक इसी स्थिति में रहने के बाद १ जनवरी २००८ से यह साप्ताहिक रूप में हर सोमवार को प्रकाशित होती है। आज वेब पर हिन्दी पत्रिकाओं की भरमार के बावजूद हमारे पाठकों की संख्या में विस्तार हो रहा है यह उत्साह की बात है। पत्रिका की टीम का सबसे बड़ा हिस्सा तो पाठक ही होते हैं इसलिए इस शुभ अवसर पर सभी पाठकों को हार्दिक धन्यवाद जिनके निरंतर स्नेह से आज हम यहाँ पहुँचे हैं। यह आपकी पत्रिका है और उसको स्तरीय बनाए रखने में आपका सहयोग महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षेत्र में कुछ सहयोग या सुझाव देना चाहते हैं तो आपका सदा स्वागत है। टीम में मेरे विनम्र और कर्मठ स्थायी सहयोगी प्रो. अश्विन गांधी और दीपिका जोशी के सतत प्रयत्नों के बिना इस पत्रिका के साथ इतना लंबा चलना संभव नही था। उनके लिए धन्यवाद या आभार शब्द बहुत छोटे हैं फिर भी मेरा हार्दिक आभार। प्रार्थना है कि सब सदा साथ रहें और इस यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित रखें।

वर्षगाँठ के इस उत्सव पर हम पाठकों के लिए कुछ विशेष उपहार लाने वाले हैं। हिंदी ब्लाग टिप्स के आशीष खंडेलवाल के प्रयत्नों से 'आज का विचार' इस अंक से नए प्रारूप में प्रस्तुत है। अब जितनी बार पत्रिका अपलोड होगी हर बार नया विचार दिखाई देगा। (और हाँ यह तिरंगा भी उन्हीं के सौजन्य से।)

इस वर्ष हम सबकी प्रिय कथा लेखिका सुषम बेदी ने अभिव्यक्ति में दस कहानियाँ पूरी की हैं। कथा-प्रेमी पाठकों के लिए अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे उनकी कहानियों का एक आकर्षक पीडीएफ़ संग्रह। इसे डाउनलोड परिसर से मुफ़्त डाउनलोड किया जा सकेगा है। अभिव्यक्ति के रंगरूप में भी कुछ परिवर्तन किए गए हैं। आकार को लंबाई में थोड़ा कम और चौड़ाई में बढ़ाया गया है जिससे पृष्ठ को ज्यादा नीचे तक न ले जाना पड़े। नया अंक तीन में से बीच के कॉलम में है। पुराना दाहिनी ओर तथा मनोरंजन और जानकारियाँ बिलकुल बाएँ स्तंभ में है। आशा है पाठक इन परिवर्तनों के संबंध में अपनी राय और सुझाव भेजते रहेंगे।

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

टूटे गिटार का ग़म


कहते है शब्द के वार का घाव तलवार से गहरा होता है और संगीत की शक्ति से बुझे दिये जल उठते हैं। कहने की बात नहीं कि अगर ये दोनों साथ हो तो ताकत का ऐसा स्रोत बह सकता है जिससे कुछ भी जीता जा सकता है। जीत कितनी सहज हो सकती है और कितनी कठिन यह कहना आसान नहीं फिर भी इन दोनों ताकतों को साथ लेकर देव कैरोल साहब निकल पड़े हैं व्यवस्था के विरोध में।

देव कैरोल कैनेडा के पॉप गायक हैं और उनका एक छोटा सा पॉप समूह है जिसके साथ वे देश विदेश की यात्रा करते हुए अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। पिछले साल, ऐसी ही किसी संगीत यात्रा में जब वे यूनाइटेड एअरलाइन के साथ उड़ान भर रहे थे तब यात्रियों के सामान की देखरेख करने वालों की गलती से उनका साढ़े तीन हज़ार कैनेडियन डॉलर का कीमती गिटार टूट गया। देव साहब कहते हैं कि उन्होंने विमान की खिड़की से सामान उठाने वाले कुलियों को गिटार फेंकते हुए देखा। विमान कंपनियाँ आसानी से अपनी गलती नहीं मानतीं। वे हवाई अड्डे के अधिकारियों पर दोष मढ़ती हैं और हवाई अड्डे के अधिकारी माल ढोने वाली कंपनियों पर। इन सबके बीच अलग अलग अधिकारियों से मिलते हुए मुआवज़ा पा लेना किसी मुसीबत से कम नहीं। देव साहब भी इस भाग दौड़ से तंग आगए और उन्होंने इससे निबटने के लिए एक गीत बनाया यूनाइटेड ब्रेक्स गिटार्स। इसका वीडियो बनाकर उन्होंने ६ जुलाई २००९ को वेब पर अपलोड किया तो पहले चार दिनों में ही इस पर दस लाख से ज्यादा हिट लगे। टूटे दिल का संगीत किसे लूट नहीं लेता? मालूम नहीं इस शब्द और संगीत की शक्ति से एअरलाइन के कान पर जूँ रेंगी या नहीं पर देव साहब की लोकप्रियता के नए रेकार्ड ज़रूर कायम हो गए। सुना है देव साहब ने अपना गिटार खुद ही पैसे खर्च कर के मरम्मत करवा लिया है पर उसकी आवाज़ अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी। रहीमदादा कह ही चुके हैं- टूटे फिर से ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ि जाय।

हवाई यात्रा में वाद्ययंत्रों के टूटने और इससे टूटे दिल द्वारा संगीत रचने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले एक अमरीकी गायक टॉम पैक्सटन महोदय भी टूटे गिटार के लिए गीत गाकर रिपब्लिक एअरलाइन को गालियाँ दे चुके हैं। दुख की बात है! लेकिन खुशी की बात यह है कि हमारी गालियाँ गाने की खालिस भारतीय परंपरा भी सात समुंदर पार पहुँच गई है और वेब पर परचम लहरा रही है। काश हमने इसे समय रहते पटेंट करवा लिया होता। हम तो सिर्फ होली या विवाह आदि के अवसरों पर गालियाँ गाते हैं जबकि ये लोग हर जगह गा रहे है। यह सब कहानियाँ पढ़ते हुए मुझे अपनी बहन की याद आ रही है जो बीस साल पहले अपने महीने भर के वेतन से खरीदे गए कीमती हारमोनियम को एअरलाइन की हिदायतों के अनुसार तरह तरह से पैक कर के दिल्ली से सैन होज़े के लिए उड़ी और वहाँ पहुँचकर उसे बक्से में हारमोनियम की बजाय हारमोनियम के हज़ार टुकड़े मिले। फ़ोन पर हारमोनियम की बात करते उसकी सिसकियाँ रोके न रुकती थीं। बहना तुमने क्यों न कोई गीत बनाकर वेब पर अपलोड किया?

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

तब और अब


आजकल की चौड़ी सड़कों को देखकर, जिनमें कारों की ६-६ गलियाँ एक ही ओर जाती हों, कौन विश्वास करेगा कि सड़कों पर मस्ती वाले पल दुनिया के सबसे यादगार पल होते हैं।

धीरे धीरे किसी दुपहिया लंबे ठेले का गुज़रना और उसकी चूँ चाँ के साथ सुर मिलाते हुए लापरवाह चलते जाना। झरती हुई नीम की एक एक पत्ती को गिरने से पहले हथेली में रोक लेने की ज़िद में घंटों उसकी धूप-साया में गुज़ारना। कभी बड़ के घने पेड़ के नीचे चियें की गुठलियों से गोटियाँ बनाना और बंद हथेलियों में कौड़ियों की आवाज़ें सुनना। किसी बच्चे का पहिए को सरिया से घुमाते हुए चलते चले जाना सर्र् र्र् र्र्...।

कैसे सुस्त सुस्त आराम के दिन! हवाई चप्पलों में पैर अटकाए सारे दिन दौड़ते फिरना कभी इस घर कभी उस। दौड़ ऐसी कि जिसका अंत नहीं, दोस्ती ऐसी कि हर पल कट्टी और फिर भी जान गुइयाँ में ही अटकी। सड़क पर चोर-चोर खेलना और अनजान घरों के बरोठों में जा छिपना। न कोई डर न फ़िक्र।

बरसाती की खिड़की से दूर तक फैले बादल की बड़ी सी छाया को धीरे धीरे पहाड़ पार करते हुए देखना और ठंडा मीठा बर्रेफ़ की आवाज़ सुनते ही सीढ़ियाँ फलाँगते हुए नीचे आना, यह सब दूसरी दुनिया के दिन हो गए। लगता है जैसे पिछले जनम की बातें हों। वह शहर छूटे भी तो बरसों हो गए। सोचती हूँ फिर कभी लौटना हुआ और सब कुछ वैसा ही मिला तो क्या वैसी ही खुशी होगी?

सोमवार, 20 जुलाई 2009

या हबीबी!


दुबई में एक भारतीय के लिए सबसे हैरानी की बात यह है कि अक्सर अरबी लोग शाम को चार पाँच बजे मिलने पर गुड मार्निंग कहते हैं। तब समझ में नहीं आता कि अपनी होशियारी दिखाते हुए इसका उत्तर गुड ईवनिंग में दिया जाए या उनकी इज़्ज़त रखते हुए गुड मॉर्निंग कहा जाए। यह मुझे काफ़ी बाद में पता चला कि अरबी में गुड आफ्टर नून या गुड ईवनिंग के लिए शब्द नहीं हैं। वे सुबह से शाम के पाँच छे बजे तक, जब तक अँधेरा न हो जाए सबा अल ख़ैर या गुड मॉर्निंग ही कहते हैं। मिसा अल ख़ैर या गुड ईवनिंग का प्रयोग रात में ही होता है। हम भी हिन्दी में सुप्रभात और शुभरात्रि का प्रयोग काफ़ी करने लगे हैं पर दोपहर और शाम के लिए किसी अलग शब्द का प्रयोग आमतौर पर नहीं करते। यों भी हमारा नमस्ते सदाबहार है। हर समय हर किसी से कहा जा सकता है।

इसी प्रकार अरबी में एक शब्द है हबीबी। शायद दुनिया की किसी अन्य भाषा में ऐसा शब्द नहीं। हबीबी का हिन्दी अनुवाद प्रिय या मित्र हो सकता है लेकिन इस शब्द की सीमाएँ अनंत हैं। किसी से पहली बार भेंट हो तो भी उसको हबीबी कहा जा सकता है। ग्राहक दूकानदार को हबीबी कहता है और दूकानदार ग्राहक को, उम्रदराज़ महिलाएँ हर किसी को हबीबी कहती हैं और बच्चे भी ब‌ड़ों को हबीबी संबोधित करते हैं। फ़ोन पर हलो हबीबी कह देना आम बात है। अजीब तब लगता है जब अरबी लोग अँग्रेज़ी बोलते हुए उतनी ही सहजता से डियर शब्द का प्रयोग करते हैं। कुल मिलाकर यह कि अगर अरबी व्योमबाला या व्योम बालक आपको डियर कह दे तो बहुत खुश या नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं।

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मौसम तरह तरह के



कुछ लोगों को यह सुन कर आश्चर्य होगा कि इस दुनिया में ऐसे देश भी हैं जहाँ वर्षा ऋतु नाम का कोई मौसम नहीं होता, न सावन का महीना न कल कल बहती नदियाँ और न हौले हौले चलती रेलगाड़ियाँ। अब बताइए इस देश की नायिका सावन के महीने में रेलगाड़ी से नदी पार कर आने वाले रिमझिम में भीगते नायक की प्रतीक्षा कैसे करेगी? जी हाँ मैं इमारात की बात कर रही हूँ। यह देश वर्षा ऋतु से बिलकुल अछूता है।

इसके विपरीत मध्य या पश्चिम यूरोप में रहने वालों को इस बात पर आश्चर्य होता है कि भारत के लोग बारिश होने पर इतना खुश क्यों होते है, या बारिश का एक अलग मौसम कैसे हो सकता है? या फिर क्या साल के बाकी दिनों बारिश ही नहीं होती? उन लोगों को समझाना मुश्किल है कि गर्मी या सर्दी के मौसम में भारत में बारिश नहीं होती है। वर्षा का मौसम होता है और उसी में बारिश होती है यह अलग बात कि गलती से कभी सर्दी या गर्मी में बारिश हो जाय।

अलग अलग देशों के निवासियों के अलग अलग सवाल और सबको सब कुछ समझा पाना आसान भी नहीं। क्या आप विश्वास करेंगे कि गर्मियों की रातों को इमारात में इतनी ओस गिरती है कि सुबह उठने पर आँगन या लॉन पूरी तरह भीगे हुए मिलते हैं? लंबी लंबी उँगलियों वाली ताड़ की हथेलियाँ खूब सारी ओस समेट कर अपने जटा-जूट से लपेटे गए तने को तर कर लेती हैं और इस तरावट में सारी दोपहर हरी भरी और तरोताज़ा बनी रहती हैं।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

धुंध में डूबा ग्रीष्माकाश


जुलाई अगस्त के महीने मध्यपूर्व में गर्मी के होते हैं। कभी ऐसी गर्मी देखी है जब आसमान कोहरे से ढक जाए? इमारात में पहली बार जब ऐसी धुंध देखी तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा क्योंकि भारत में तो धुंध सिर्फ सर्दियों के दिनों में होती थी। गर्मी के मौसम में यहाँ आमतौर पर पाँच-सात दिन ऐसे होते ही हैं। आज शारजाह में वही कोहरेवाला दिन है। दोपहर तक दुबई और शारजाह का कोहरा काफ़ी कुछ छँट गया था जबकि आबूधाबी में इसके दिनभर जमे रहने की संभावना जताई गई है। गर्मी भी कलेंडर देखकर आती है। जैसे इंतज़ार कर रही हो कि कब जून खत्म हो और कब वो अपने कदम धरा पर उतारे।

भारत में होने वाली मानसूनी बारिश खाड़ी के देशों में घनी नमी पैदा करती है। पिछले दो दिनों से नमी का स्तर बढ़ कर ९० प्रतिशत तक पहुँच रहा था। शाम को बाहर टहलना पसीने में नहाने जैसा था। नमी से तापमान में तेज गिरावट हुई और आज मौसम पर धुंध छा गई। समाचार है कि कुवैत, सऊदी और ईराक की ओर से उठने वाली उत्तर पश्चिमी हवाओं से बना धूल का तूफ़ान इमारात की ओर बढ़ रहा हैं। यह तूफ़ान आगामी तीन दिनों तक साँस की तकलीफ़ वालों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है पर शुभ समाचार यह है, कि पिछले दो दिनों में ५० डिग्री सेलसियस से ऊपर चढ़ता हुआ अधिकतम तापमान, आने वाले तीन दिनों तक ४० डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाएगा। नमी का स्तर भी कम होकर ५५ प्रतिशत पर आ गया है। सो गर्मी की तंग साँस में राहत पाकर लोग भी सड़कों पर आ गए हैं देखिए चित्र में एक नवयुवक किस तरह के हथियारों से लैस होकर गर्मी का आनंद ले रहा है।

नमी, धुंध और रेत के तूफ़ान खाड़ी देशों के लिए कोई नई बात नहीं लोग इनका जमकर मज़ा लूटते हैं। जरा पारा ४० डिग्री पर पहुँचा नहीं कि समुद्र तटों बाज़ारों, फुहारों और आइस्क्रीम की दूकानों पर मेले लग जाते हैं। अखबार छापते रहते हैं कि गर्मियों में सुरक्षित कैसे रहें- छाता हमेशा साथ रखें... त्वचा को नम रखने के लिए कोई क्रीम लगाएँ... पुदीना, इलायची या सौंफ़ चबाते रहें... तरबूज, नाशपाती और आम खाएँ... जूते की बजाय खुले सैंडिल पहनें और त्वचा जल जाए तो ठंडा पानी डालें। उत्तर भारत की सख्त गर्मीवाली लखनऊ या जयपुर की कड़ी दोपहर में घंटों धूप में घूमने के बावजूद त्वचा जलने का अनुभव मुझे कभी नहीं हुआ। पर यहाँ १० मिनट की धूप में ज़रा सा समय बाहर रहने पर ही कलाई के पास एक लाल चकत्ता उभर आया है। दवा लगाई है। पहले यह काला होगा फिर पपड़ी बनकर झर जाएगा। माँ बचपन में कहती थीं- धूप में मत घूमो काली हो जाओगी। अब मैं उनसे कहती हूँ- भारत की धूप रंग चाहे बदल दे पर जलाती नहीं है।

बुधवार, 1 जुलाई 2009

मोधेश की महिमा

इमारात में गरमियाँ आ गई हैं। गर्मियाँ यानी कमरों, बाज़ारों और मनोरंजन स्थलों में ए.सी. के अंदर बंद रहने का मौसम। पार्कों और सागर तटों को भूल जाने का मौसम। स्कूलों में गर्मी की छुट्टियाँ हो गई हैं और ज्यादातर प्रवासी अपने अपने देश को चले गए हैं। शहर सुनसान है और सड़कें शांत। इस सबके बावजूद बड़े-बड़े बाज़ार खरीदारों को आकर्षित करने के लिए सेल और मनोरंजन के अनोखे इंतज़ाम में लग गए हैं। नृत्य-संगीत, कलाबाज़ियों और रैफ़ेल ड्रा के ज़बरदस्त हंगामे जारी हैं। पूरी कोशिश है कि लोग घर में बंद होकर न रहें, मॉल में आकर पैसे फूँकें।


और इस सारे हंगामे को हवा देने के लिए मोधेश तपती दोपहर के ५० डिग्री सेल्सियस तापमान में शान से मुस्कराता हुआ हर साल की तरह में दुबई की सड़कों के किनारे आ खड़ा हुआ है। मोधेश दुबई के ग्रीष्म-कालीन व्यापार प्रमोशन यानी दुबई समर सरप्राइज़ेस का प्रतीक चिह्न है। बच्चों को इससे प्यार है और मध्यपूर्व में इसकी लोकप्रियता मिकी माउस से कम नहीं। हाँलाँकि यह मिकी माउस की तरह किसी कहानी का हिस्सा नहीं, शत-प्रति-शत व्यापार उत्सव का व्यापारिक प्रतीक है। इसका चमकीला पीला रंग दुबई की चटक धूप से मिलता है और यह स्प्रिंग वाले उस गुड्डे जैसा है जो डिब्बे का ढक्कन खुलते ही उछलकर बाहर आता है। इस दृष्टि से यह समर और सरप्राइज़ दोनों शब्दों का ठीक ठीक प्रतिनिधित्व करता है।


मोधेश अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है आश्चर्यजनक! लाजवाब!! इसके ताज में लगे सात नगीने इमारात के सात राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसकी रचना दुबई में काम करने वाले एक फ़िलीपीनो फ्रीलांस डिज़ाइनर रुमुलो मिक्लात ने २००१ में की थी। आज उन्हें भी इसकी लोकप्रियता को देखकर आश्चर्य होता है। कपड़ों से लेकर लिफ़ाफ़ों तक पर मोधेश छाया है। टीवी और मीडिया की बात तो जाने ही दें। दुबई का हर यात्री जो भी दुबई समर सर्प्राइज़ के दिनों में यहाँ आया है मोधेश की खुली बाहों और चौड़ी मुस्कान को कभी भूल नहीं सकता।

सोमवार, 22 जून 2009

हंगामा-ए-जलाबिया


इमारात में आजकल पेरिस हिल्टन का हंगामा है। अभिनेता अभिनेत्रियों के हंगामे न हों तो फिर जीवन व्यर्थ। सो हंगामा हुआ पेरिस के जलाबिए को लेकर। आप पूछेंगे कि जलेबी को जलाबिया कहने की क्या तुक है लेकिन बात जलेबी की नहीं जलाबिया की ही है।

बात यह है कि आजकल पेरिस हिल्टन अपने शो 'माई न्यू बी.एफ.एफ. ' के साथ दुबई पर कब्जा जमाए हैं कभी अखबार में छप रही हैं, कभी इंटरव्यू दे रही हैं, तो कभी प्रेस कान्फ्रेंस। वायदे पर वायदे कर रही हैं कि वे मध्यपूर्व की संस्कृति का हर तरह से सम्मान करेंगी और उनके इमाराती कार्यक्रम में ऐसी-वैसी कोई बातें नहीं होगी जैसी अमेरिकी या यूरोपीय कार्यक्रमों में होती रही हैं। यहाँ यह बता देना रोचक होगा कि बी.एफ.एफ. का अर्थ है बेस्ट फ्रेंड फ़ार एवर लेकिन यह अर्थ समय समय पर अपने रूप बदलता रहा है। उदाहरण के लिए इमारात में इसे बिज़ार फ़ेमस फ्रेंडशिप्स के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि पेरिस का यह शो राखी सावंत के स्वयंवर से मिलता जुलता है। खैर इतना तो तय है कि पेरिस अरबियों को हर हाल में लुभा लेना चाहती हैं और लुभाने का भला इससे अच्छा उपाय क्या हो सकता है कि जिस देश में आप जाएँ उसी देश का परिधान पहन लें। बस इसी मंत्र को ध्यान में रखते हुए १७ जून की प्रेस कान्फ्रेंस में पेरिस ने जलाबिया धारण कर लिया। जलाबिया भी ऐसा वैसा नहीं, दुबई की प्रसिद्ध ड्रेस डिज़ाइनर ज़ारा करमोस्तजी का डिज़ाइन किया हुआ ज़री के काम का हरा जलाबिया जिसे पिछले साल मियामी फैशन वीक में सर्वश्रेष्ठ रात्रि-परिधान के रूप में सम्मानित करते हुए पुरस्कार दिया गया था।

हाँ तो कान्फ़्रेंस में जब पत्रकारों ने पेरिस से उनके जलवागर जलाबिए के डिज़ाइनर का नाम पूछा तो पेरिस ने सारा बेल्हासा का नाम लिया। धड़ाधड़ मीडिया में सारा बेल्हासा का नाम चमक गया। हंगामा अगले दिन हुआ जब ज़ारा करमोस्तजी मियामी फैशन वीक की तस्वीरें लेकर मीडिया के पास पहुँचीं और यह राज़ खोला कि जलाबिए की डिज़ाइनर ज़ारा करमोस्तजी हैं न कि सारा बेल्हासा। अगले दिन हर अखबार में वे चित्र छपे जो इस लेख के प्रारंभ में हैं। दुनिया सन्न! कि आखिर सारा बेलहासा कौन है और बीच में कहाँ से आ गईं? बाद में सारा ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी इस जलाबिए का डिज़ाइनर होने का दावा नहीं किया। वे तो सिर्फ़ सारा बेलहासा नामक उस नामचीन शोरूम की मालकिन हैं जो दुबई में दुनिया के जाने माने डिज़ाइनरों के डिज़ाइन किए हुए परिधान बेचता है। पेरिस की स्टाइलिस्ट ने यह जलाबिया सारा की दूकान से खरीदा था, शायद इसीलिए यह नाम उनकी ज़ुबान पर आ गया।

अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि जलाबिया आखिर है क्या। ईवनिंग गाउननुमा यह परिधान अरबी महिलाओं द्वारा पहना जाता है। चित्र में बायीं ओर पेरिस हैं प्रेस कान्फ़्रेंस में और दाहिनी ओर एक मॉडेल मियामी फैशन वीक में। अच्छी तरह देखना चाहें तो चित्र को क्लिक करके बड़ा आकार देख सकते हैं।

गुरुवार, 11 जून 2009

डोनल्ड का पचहत्तरवां जन्मदिन


इस मंगलवार को डोनल्ड ने अपने जीवन के पचहत्तर वर्ष पूरे किए हैं, बढ़ती उम्र के साथ उसकी लोकप्रियता भी दिन पर दिन बढ़ती ही गई है। वाल्ट डिज़्नी के इस कार्टून चरित्र को पहली बार ९ जून १९३४ को पर्दे पर उतरा गया था। अनेक कार्टून कथाओं के अतिरिक्त वह १८ फ़ीचर फ़िल्मों, १५० से अधिक छोटी कार्टून फिल्मों, ८ टेलीविज़न धारावाहिकों और २१ वीडियो गेम्स में प्रमुख भूमिका निभा चुका है। सिली सिम्फनीज की ‘द वाइज लिटिल हेन डोनल्ड’, डोनल्ड की पहली फ़िल्म थी। फ़िल्मों में आने के लिए उसे हर फ़िल्मी कालाकार की तरह मेकओवर की ज़रूरत हुई। यह उत्तरदायित्व निभाया रिचर्ड डिक लंडी ने, जो अपने समय के प्रसिद्ध एनिमेशन कलाकार और फ़िल्म निर्माता थे। उन्होंने इसे नीली सेलर कमीज दी और टोपी में पंख लगा दिया। फिर क्या था डोनल्ड तो उड़ चला।

११ अगस्त १९३४ को ‘द लिटिल वाइज हेन’ के निर्देशक बट जिलेट ने उसे मिकी माउस की फिल्म ‘द ऑफ्रेंस बेनिफिट’ मे काम करने का मौका दिया। अब तक वह मिकी, मिनी, गूफी और प्लूटो की शैतान फौज के साथ धमाचौकड़ी मचाने में उस्ताद हो चुका था। ये सभी पात्र एक साथ १९३५ में मिकीज सर्विस स्टेशन कार्टून फिल्म में दिखाई दिए। एक साल में १९३५ तक डोनल्ड दर्शकों को रिझाना सीख चुका था। ९ जनवरी १९३७ में वह पहली बार नायक की भूमिका में दिखाई दिया। उसे डेजी डक का साथ मिला और उसके भतीजे लुई, हुई और डुई भी फिल्मों में दिखाई देने लगे। निर्देशक जैक किंग ने अंकल डोनल्ड के साथ तीनों भतीजों को लेकर अपनी फिल्म ‘डोनाल्ड्स नेफ्यूज’ बनाई। १९४९ तक डोनल्ड मिकी के साथ दुनिया का सबसे प्रसिद्ध कार्टून पात्र बन चुका था।

उसने नाजियों की प्रचार फिल्मों में भी काम किया। फिल्म की तस्वीरों में उसे अडॉल्फ हिटलर को सलामी देते हुए दिखाया गया था। इनमें से एक फिल्म ‘डेर फ्यूहुएर्स फेस’ १९४३ में पुरस्कृत भी हुई। डोनल्ड ने ‘स्काई ट्रूपर’, ‘फॉल आउट, फॉल इन’ और ‘कमांडो डक’ जैसी सैन्य पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में काम किया। फिर क्या था सेलर शर्ट के कमाल से उसे संयुक्त राष्ट्र की कोस्ट गार्ड आग्जिलरी का मस्कट होने का सौभाग्य भी मिल गया। अमेरिकी रेडियो कलाकार क्लेरेंस नैश वे व्यक्ति थे जिनकी आवाज सुनकर डिज्नी के मन में डोनल्ड के चरित्र ने जन्म लिया था। नैश जीवन भर डोनल्ड को अपनी आवाज़ देते रहे। परंतु १९८५ में उनकी मत्यु के बाद भी डोनल्ड की आवाज़ बंद नहीं हुई। उसे जारी रखने का काम किया टोनी अन्सेल्मो ने।

१९८४ में जब डोनल्ड पचास साल का हुआ तो संयुक्त राष्ट्र की सेना में उसकी भी पदोन्नति हुई, वह सार्जेन्ट से आर्मी अफसर बन गया। इस अवसर को रेखांकित करने के लिए एक समारोह का आयोजन विधिवत उसी प्रकार किया गया जैसी अमेरिकी सेना में पारंपरा है। यह एक विशेष अवसर था सो गर्लफ्रेंड डेजी डक की उपस्थिति भी वहाँ बनी रही। डिज़्नी के अन्य कार्टून चरित्रों की तरह डोनल्ड बच्चा नहीं है बल्कि प्रौढ़ है लेकिन उसका भोलापन बच्चों को भी मात देता है। शायद इसी भोलेपन में उसकी लोकप्रियता का रहस्य छुपा है।

मंगलवार, 2 जून 2009

सभ्यताओं के संवाद - फेंकते हुए



आधुनिक सभ्यता ने हमें जो चीज़ सबसे ज्यादा सिखाई है वह है फेंकना। एक थे बाबा कबीर जो जतन से ओढ़ के चदरिया ज्यों की त्यों धर देते थे। आज न वैसी चदरिया है और न वैसे ओढ़नेवाले। आज की चदरिया है डिस्पोज़ेबल। इमारात के स्वास्थ्य केन्द्रों में देखें तो हर चिकित्सक की परीक्षण मेज़ के सिरहाने टिशू के रोल जैसे चादरों के रोल लगे हैं। नया मरीज़ आया रोल खींचा, नई चादर बिछा दी। मरीज़ गया, चादर फाड़ी, फेंक दी।

गनीमत है कि घर इससे बचे हुए हैं। वर्ना कथरियों का बहुरंगी सौंदर्य ऐतिहासिक हो जाता। जिसने राजस्थान या गुजरात देखा है वह कथरियों के सौंदर्य को कभी भूल नहीं सकता। माँ आनंदमयी का आश्रम याद आता है जहाँ जिस कुल्हड़ में खीर खाते थे उसी में पानी पीते थे, कुल्हड़ में गोरस लगा हो तो उसको फेंका नहीं जाता था। अब गोरस तो ऐतिहासिक हो चुका। सहवाग ब्रांडेड दूध पीते हैं और डब्बा फेंकते है। कार्यालय में देखें तो पानी के डिस्पेंसर पर प्लास्टिक के गिलास रखे हैं। एक बार खाना खाते समय दो बार पानी पीना हो तो दो गिलास फेंको।

फेंकने से रसोई में गंदे बर्तन जमा नहीं होते, फेंकने से रोग नहीं फैलते। फेंकना ही सफ़ाई है, फेंकना ही सौंदर्य है, फेंकना ही प्रतिष्ठा है। जतन का कोई महत्व नहीं। धोनी भी यही कहते हैं नया जमाना है नए कपड़े पहनो, पुराने फेंक दो (और नए खरीदने के लिए अपने माँ बाप के मेहनत से कमाए गए पैसे फेंक दो)। फेंकना सिर्फ पैसों और चीज़ों तक सीमित रहे वहाँ तक तो ठीक पर संस्कृति और मानवीय मूल्यों तक पहुँचे तो क्या होगा?

मंगलवार, 26 मई 2009

बीते हुए दिन... हाय!

शारजाह क्रिकेट स्टेडियम शारजाह की शान है। आखिर इसी के कारण तो इमारात के इस छोटे से सुंदर शहर को घर घर में पहुँचने का अवसर मिला और रातों रात लोग इसके उन प्रमुख स्थलों को पहचानने लगे जो लाइव क्रिकेट के मध्यांतर में दिखाए जाते थे। क्या आप उन खूबसूरत महिलाओं को कभी भूल सकते हैं जो दुबई के फैशनेबल बाज़ारों से खरीदे गए बड़े-बड़े बुंदे पहने दर्शक दीर्घा में हँसती बतियाती दिखती थीं और जिन पर कैमरा बार-बार ठहर जाता था। इसी स्टेडियम के कारण शारजाह को विश्व में सबसे अधिक एक दिवसीय क्रिकेट आयोजित करने का कीर्तिमान प्राप्त हुआ था। १९८४ से २००३ तक बीस वर्ष के अपने स्वर्ण युग से गुजरे इस स्टेडियम में १९८ एकदिवसीय और चार टेस्ट शृंखलाओं को आयोजित करने का गौरव प्राप्त है।

१९८२ में बने इस स्टेडियम का यह कीर्तिमान दूसरे स्थान पर सिडनी के १२९ और मेलबॉर्न के १२४ एक दिवसीय मैचों से आज भी बहुत आगे है। इस महाद्वीप की दो दिग्गज टीमों के बीच मैच के शानदार दिन भूलने की चीज़ नहीं जब भारत और पाकिस्तान के बराबर दर्शक स्टेडियम को अपनी उपस्थिति से गुलज़ार किए रहते थे। उस समय शहर में शायद ही लोग किसी और विषय पर बात करते हों। उन दिनों सीमित ओवरों के खेल में एक एक रन के लिए संघर्ष करते कुछ रोमांचक पल और विश्व रेकार्डों की स्थापना के स्वर्णिम अवसर भी इस स्टेडियम के इतिहास में सुरक्षित है।

अतीत में क्रिकेट की आन-बान के प्रतीक इस स्टेडियम में अब कोई अंतर्राष्ट्रीय मैच नहीं होते। बीसवीं शती के अंत में मैच फ़िक्सिंग के कारण बदनाम हुआ यह स्टेडियम आज अपने बुरे दिनों से गुज़र रहा है। जिस समय भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच बंद हुए उसी समय से यह स्टेडियम अपना आकर्षण खोने लगा था। कुछ अंतर्राष्टी़य मैच यहाँ आयोजित किए गए पर भारत और पाकिस्तान की टीमों के बिना वे दर्शकों को स्टेडियम तक खींच लाने में सफल नहीं हुए। मानो भीड़ केवल भारत और पाकिस्तान के मैच ही देखने आती थी। बाद में यहाँ कुछ सफल संगीत कार्यक्रम आयोजित किए गए कभी कदा कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए इसका प्रयोग किया गया पर जो बात पहले क्रिकेट की थी वह नहीं बन पाई।

लोकप्रियता घटी तो रखरखाव और सौंदर्य में कटौती झेलता यह स्टेडियम अपना रूप खोने लगा। जिसे भी शारजाह और क्रिकेट से प्यार है वह स्टेडियम के इस रूप को देखकर दुखी है। आज के स्थानीय समाचार पत्र में इमारात क्रिकेट बोर्ड के प्रबंधक मज़हर ख़ान का वक्तव्य छपा है। वे कहते हैं कि नई क्रिकेट शृंखला के आयोजन के लिए बातचीत जारी है। अगर सब निश्चित हो गया तो चार महीने में वे इस स्टेडियम का कायाकल्प कर देंगे। यह वक्तव्य आशा की किरन लेकर आया है। शायद बीते हुए दिन लौटने वाले हैं।

सोमवार, 18 मई 2009

यार ख़ैयार


गरमी की तपन और ख़ैयार (या ख़ियार) की तरावट का मज़ा वही जान सकता है जो इमारात में रहता है। ख़ैयार अरबी खीरा है जो यहाँ हर मौसम में मिलता है और तरह तरह से खाया जाता है। चाहे ख़ैयार-बि- लबान बनाएँ, मास्त-ओ-ख़ैयार बनाएँ या बोरानि-ए- ख़ैयार बनाएँ यह सब मिलते जुलते व्यंजन है जिन्हें खीरे को दही और पुदीने के साथ मिलाकर बनाया जाता है।

ज़ाहिर है इमारात की गरमी में दही और पुदीने के साथ मिली खीरे की तरावट का जवाब नहीं। ख़ैयार का अचार भी बनता है। कोई अरबी दावत ऐसी नहीं जो ख़ैयार के बिना पूरी हो। कोई सब्ज़ी की दूकान, कोई सुपर मार्केट कोई परचून की दूकान ऐसी नहीं जहाँ ख़ैयार न मिलता हो। रहीम दादा कह गए हैं-- खीरा मुख से काट कर मलियत लोन लगाय, लेकिन ख़ैयार तो जन्मा ही मीठा है। न मुख काटने की ज़रूरत न लोन मलने की। छिक्कल भी बिलकुल पतला जिसे छीलने तक की ज़रूरत नहीं बस खरीदो और खा लो।

कुदरत ने इस देश को गरमी की सज़ा के साथ मीठे स्वादिष्ट ख़ैयार का वरदान दिया है। यहाँ शायद ही कोई घर हो जहाँ ख़ैयार रोज़ न खाया जाता हो। देखने में भारत की चिकनी तुरई जैसी शक्ल वाला ख़ैयार इमारात में हर मौसम का यार है। इस देश में जीना है तो ख़ैयार से यारी बड़े काम की है क्यों कि ख़ैयार इस देश की आत्मा है और आत्मा के बिना भी कोई ज़िन्दगी होती है।

बुधवार, 13 मई 2009

शावरमा


शावरमा अरब दुनिया का समोसा है। हर सड़क पर इसकी एक दूकान ज़रूर होगी। मज़ेदार नाश्ता तो यह है ही, जल्दी हो तो सुबह या शाम का खाना भी इससे निबटाया जा सकता है।

शावरमा दो चीज़ें मिलाकर तैयार होता हैं। खमीरी रोटी जिसे खबूस कहते हैं और मसाला जो खबूस में भरा जाता है। खबूस कुछ कुछ भटूरे जैसी होती है लेकिन यह तली नहीं जाती भट्ठी में सेंकी जाती है। भरावन आमतौर पर ३ तरह की होती है मुर्गे, मीट या फ़िलाफ़िल की। फिलाफिल दाल के पकौड़े होते हैं जो तल कर बनाए जाते हैं और तोड़कर खबूस में भरे जाते हैं। मुर्ग या मीट को मसाले के साथ एक घूमती हुई स्वचालित छड़ी में बिजली के हीटर के सामने रोस्ट किया जाता है। जब बाहरी परत नर्म और सुनहरी हो जाती है तब तलवार जैसी बड़ी छुरी से उसको फ्रेंच फ्राई जैसा काट देते हैं और खबूस की दो परतों के बीच सलाद, तुर्श, ताहिनी और फ्रेंच फ्राई के साथ भर कर रोल बना देते हैं।

ताहिनी, लहसुन की हल्की गंधवाला, स्वाद में रायते जैसा होता है। तुर्श के नाम से ही जान सकते हैं कि यह तीखा और खट्टा होता है जिसे गाजर, हरी मिर्च और चुकंदर में सिरके के साथ नमक और कुटी मिर्च डालकर तैयार किया जाता है। गरम गरम शावरमा के साथ पिया जाता है ठंडा लबान, पर उस विषय में फिर कभी। हाँ बदलते समय के साथ लबान की जगह कोकाकोला लोकप्रिय होने लगा है, साँच को आँच क्या आप खुद ही देख लें।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

खोती हुई आवाज़ें


फुटबॉल इमारात का राष्ट्रीय खेल है। यहाँ के गर्म मौसम के कारण खेल का समय साल में कुछ दिन ही रहता है- सर्दियों के महीनों में। सर्दियाँ भी बिलकुल हल्की गुलाबी रौनक भरी दुपहरी वाली। इन दिनों आवासीय कॉलोनियों की हर सड़क पर फुटबॉल की ऐसी धूम रहती है जैसी भारत में क्रिकेट की। खेल की भी एक आवाज़ होती है.... विजय में डूबी उमंग की, जोश से भरे उत्साह की, कारों के भयभीत हॉर्न की, खिड़की के बिखरते काँच की, बच्चों पर बरसती फटकार की। ये आवाज़ें बड़ी लुभावनी होती हैं और पूरे मुहल्ले को अपने रंग से भर देती हैं।

मई के आरंभ तक यहाँ सर्दियों का अंत हो जाता है। यानी दिन सुनसान होने लगते है। पिछले दस सालों में इमारात की संस्कृति में तेज़ी से बदलाव आया है। लगभग पूरा दुबई काँच की गगनचुंबी इमारतों में परिवर्तित हो गया है। पुराने मुहल्ले या तो ख़त्म हो गए हैं या ख़त्म होने की कगार पर हैं। इनके स्थान पर काँच की दीवारों वाली बहुमंज़िली इमारतें आ गई हैं। जो मुहल्ले बच गए हैं, उनमें रहने की अलग शैली है। इनके आलीशान घरों में रहने वाले आभिजात्य बच्चे सड़कों पर नहीं खेलते। वे फुटबॉल के लिए बनाए गए विशेष मैदानों पर खेलते हैं। विशेष मैदान होना अच्छी बात है, पर विकास के साथ हम बहुत सी दिलकश आवाज़ों को भी खो रहे हैं जो भविष्य में कभी कहीं सुनाई नहीं देंगी। सड़कों पर खेलते हुए बच्चों की आवाज़ें भी उनमें से एक हैं।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

हरा समंदर गोपी चंदर


इमारात में दो तरह के समंदर हैं। एक पानी का और दूसरा रेत का। रेत समंदर जैसी क्यों और कैसे दिखाई देती है यह वही जान सकता है जिसने रेगिस्तान देखा हो। रेत में भी समंदर की तरह लहरें होती हैं, तूफ़ान होते हैं और जहाज़ होते हैं। रेगिस्तान के जहाज़ यानी ऊँट। दूर से देखने पर रेत में गुज़रता हुआ ऊँट, पानी में गुज़रते जहाज़ की तरह मद्धम डोलता है और धीरे-धीरे आँखों से ओझल हो जाता है, क्यों कि समंदर चाहे पानी का हो या रेत का दोनों ही होते हैं अंतहीन।


समंदर में तूफ़ान आता है तो लहरे तट पर सर पटकती हैं पर रेत में तूफ़ान आता है तो यह पूरे शहर में बवाल करती फिरती है। कार के शीशे पर गुलाल की तरह बरसती है, चौड़ी सड़कों पर बवंडर की तरह दौड़ती है और घरों के बरामदों में ढेर की तरह आ जुटती है।


यहाँ पानी का समंदर होता है हरा और रेत का समंदर लाल। दूर क्षितिज पर जब यह हरा समंदर नीले आसमान के साथ क्षितिज रेखा बनाता है तो मुझे क्षितिज के पार भारत का समंदर याद आता है, जो हरा नहीं नीला होता है और बहुत दूर तक आसमान के साथ बहते हुए उसमें विलीन हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हम भारतवासी दूर दूर तक हर देश में उस देश के हवा पानी के साथ घुल-मिल जाते हैं।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

आवजो... फिर आना


खाना जीवन की पहली ज़रूरत तो है ही, विलासिता में भी यह पहले स्थान पर है। एक समय था जब थाली वाले होटल आम-आदमी के भोजन की सस्ती जगह समझे जाते थे। आज यह सस्ती थाली नाज़ो-नखरे के साथ, विभिन्न देशों के अनेक होटलों और रेस्त्राओं से सजे दुबई में लोकप्रियता के रेकार्ड बना रही है। पिछले साल यहाँ खुले 'राजधानी' नाम के रेस्त्रां के सामने लगी भीड़ से ऐसा लगता है जैसे खाना यहाँ मुफ़्त बँट रहा है। ऐसी भीड़ थाली वाले रेस्त्रां में मैंने पहले पूना के श्रेयस में देखी थी। पर वहाँ के भोजन में मराठी अंदाज़ हैं और यहाँ इस रेस्त्रां के गुजराती। पतली कार्निस पर रखी लकड़ी की धन्नियों वाली छत से सजे इस रेस्त्रां की आंतरिक सज्जा में पारंपरिक सौंदर्य भरने का सुरुचिपूर्ण प्रयत्न किया गया है।

भारत में पहले ही 'राजधानी थाली' नाम से ३४ रेस्त्रां चलाने वाली इस भोजन शृंखला का यह पहला विदेशी उपक्रम था। अभी तक भारत में इसकी शाखाओं की संख्या ३८ हो चुकी है। इस बीच राजधानी थाली सिडनी और वियतनाम में भी यह अपने पाँव जमा चुकी है। ६० साल से अधिक पुराने इस पारंपरिक रेस्त्रां की पहली शाखा १९४७ में मुंबई के क्रॉफ़र्ड मार्केट में खुली थी।

खाने के पहले और बाद ताँबे के तसले में अरबी जग से हाथ धुलवाने की ऐसी परंपरा शायद दुबई के किसी अन्य रेस्त्रां में नहीं। धुएँ का छौंक लगी लस्सी लाजवाब है और अगर २८ व्यंजनों वाली थाली का खाना खाकर दिल खुश हो जाए तो आप रेस्त्रां में टंगी थाली को वहीं रखी छड़ीनुमा हथौड़ी से बजा सकते हैं। थाली की झंकार सुनते ही वेटरों का समवेत स्वर गूँजता है- आवजो यानी फिर आना और प्रवासी की आँखें गीली गीली।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

दौड़ ऊँटों की


अरबी घोड़ों का बड़ा नाम और बड़ी शान है पर अरबी ऊँटों की शान से उनका कोई मुकाबला नहीं। इसको समझने के लिए इमारात की ऊँट-दौड़ देखना ज़रूरी है। यहाँ के राज परिवार और रईसज़ादे इस खेल को बड़ी रुचि से खेलते हैं।

घोड़ों के रेसकोर्स की तरह ऊँटों के भी रेसकोर्स होते हैं पर घोड़ों की तरह उनके सवार इंसान नहीं होते। इनके जॉकी होते हैं हाईटेक रोबोट। ये रोबोट एक छोटे बच्चे जैसे दिखाई देते हैं और कोड़ा चलाते हुए चिल्लाकर ऊँट को दिशा निर्देश देते हैं। रोबोट का रिमोट होता है मालिकों के हाथ में। जिन दीर्घाओं (लेन) में ऊँट दौड़ते है वे कच्ची होती हैं, पर उसके साथ ही एक चौड़ी पक्की दीर्घा भी बनाई जाती है जिस पर ऊँट मालिकों की कारें ऊँटों के साथ-साथ दौड़ती हैं। एक कार में आमतौर पर दो व्यक्ति होते हैं। एक जो कार चलाता है और दूसरा जो रिमोट संचालित करता है। क्या दृश्य होता है! एक गली में ऊँट रेस तो तो दूसरी गली में कार रेस और वह भी एक दूसरे के साथ संतुलन साधती हुई।

दौड़ में प्रथम द्वितीय और तृतीय आने वाले विजयी ऊँटों को तुरंत सम्मानित किया जाता है उनके सिर और गले पर केसर का लेप लगाकर। इस प्रकार के लाल सिर वाले ऊँट की विशेष कार को जब अरबी अपनी फ़ोर व्हील ड्राइव से जोड़ कर घर लौटता है तो लोग उसे मुड़ मुड़ कर देखते हैं। तब उसकी शान देखते ही बनती है।

मंगलवार, 17 मार्च 2009

सुडोकु के साये में पेन्सिल और शार्पनर


सुबह सुबह ताज़े अख़बार के साथ के नए सुडोकु को भरने के लिए पेंसिल उठाई तो उसे नोकीला करने की ज़रूरत महसूस हुई। शार्पनर देखकर याद आया कि हमारे बचपन में ऐसे ढक्कन वाले शार्पनर नहीं होते थे, जिसमें पेंसिल की छीलन जमा हो जाए और बाद में इसे सुविधानुसार फेंका जा सके।

शायद तीसरे दर्जे की बात है १९६२-६३ का समय, कक्षा में पेंसिल छीलनी हो तो कोने में रखी रद्दी काग़ज़ की टोकरी तक जाने का नियम था। उस अवसर का इंतज़ार कमाल का होता था और उससे मिलने की खुशी का ठिकाना नहीं। कोई और विद्यार्थी पहले से वहाँ हो फिर तो कहना ही क्या! एक दो बातें भी हो जाती थीं और इस सबसे जो स्फूर्ति मिलती थी उसकी कोई सीमा न थी। यह सब याद आते ही चेहरे पर मुस्कान छा गई। आजकल के बच्चे उस खुशी के बारे में नहीं जानते हैं। उनके जीवन में बहुत सी नई खुशियाँ आ मिली हैं।

जानना चाहेंगे आज के सुडोकु का क्या अंत हुआ? आज का सुडोकु था चौथे नंबर का दुष्ट यानी डायबोलिक या इविल। बड़ा ही संभलकर खेला, धीरे धीरे कदम बढ़ाए, एक पूरा घंटा सूली पर चढ़ा दिया, पर... फँस ही गई अंतिम पंक्ति में, फिर हिम्मत छोड़ दी, सोचा ज़रूरी कामों को पूरा किया जाए। दुआ करें कि कल आने वाले सुडोकु में इतनी मारामारी ना हो।

यहाँ एक आसान सुडोकु है। दिल मचले तो कोशिश करें। वेब पर सुडोकु खेलने का मन करे तो यह जालस्थल सर्वोत्तम है।