सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

बात नाक की


दुनिया में नाक ऊँची रखना सबसे मुश्किल काम है। ठीक नाक के सामने, अपनी ही नाक कब कट जाए समझ पाना आसान नहीं। खुद को कुछ पता नहीं चलता, दूसरे कहते हैं तो विश्वास नहीं होता, अहसास तो तब जाकर होता है जब ज़माना कटी नाक को देख नाक-भौं सिकोड़ने लगता है।

किया भी क्या जाए, किसी की नाक में नकेल तो डाली नहीं जा सकती। समय स्वतंत्रता का है हर किसी को, हर किसी काम में अपनी नाक घुसेड़ने की पूरी आज़ादी है। आप चाहें उनकी नाक में दम कर दें, वे सुधरने वाले नहीं, नाक नीची किए चुपचाप बैठे रहेंगे और मौका पड़ते ही आपकी नाक ले उड़ेंगे। फिर अपनी नाक बचाने के लिए आप उनको नाकों चने चबवा पाते हैं, या खुद अपनी नाक रगड़ते हैं ये सब कूटनीति की बातें है, जिसका हिसाब कोई मामूली व्यक्ति नहीं दे सकता। इसके लिए तो कोई नाक वाला चाहिए और नाक वाला भी ऐसा जो नाक पर मक्खी न बैठने दे, वर्ना लोग कहने लगेंगे कि नाक कटी पर हठ न हटी।

सो दुआ यही है कि नाक रह जाए, बात रह जाए। सबकी बुरी हठ हटे पर किसी की नाक न कटे।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

चपाती और फुलका


"रोटी तो रोटी है चाहे चपाती कहो या फुलका क्या फ़र्क पढ़ता है?" लेकिन मेरे इस विचार से हरिराम जी सहमत नहीं थे। वे हमारे नए खानसामा थे। उनका कहना था, कम से कम रोज़ खाई जाने वाली चीज़ों के बारे में सबको सही जानकारी होनी चाहिए।

पहली बार उनसे जाना कि चपाती और फुलके में अंतर है। चपाती होती है ढीले और नर्म आटे की। बेलते समय ध्यान रखा जाता है कि रोटी सिर्फ़ एक ही तरफ़ से बेली जाए, ताकि फूलने के बाद इसकी एक परत बिलकुल बारीक हो जैसे छिक्कल और दूसरी परत अपेक्षाकृत मोटी। फिर आग पर बस एक पल रखा जाय फूलने तक। इस रोटी को चबाने की ज़रूरत नहीं। मुँह में रखेंगे तो ऐसे ही घुल जाएगी। बीमार को रोटी का बक्कल देना हो तो ऐसी ही रोटी चाहिए।

लेकिन फुलका अलग है। इसको चूल्हे से खाने वाले की थाली में पहुँचने तक फूला ही रहना चाहिए। इसका आटा माड़ते हैं कड़क और बेलते हैं दोनों तरफ़ से, ताकि फूलने बाद दोनों परतों की मोटाई बराबर रहे। फिर आग पर पलट-पलट कर दोनों तरफ़ अच्छी तरह चित्तियाँ डालते हैं जिससे हल्का कुरकुरापन आता है।

है ना ज्ञान की बात? तो क्या ज्ञान प्राप्त होने के बाद इस बात से कुछ अंतर पड़ता है कि आज घर में चपातियाँ बन रही हैं या फुलके?

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

यह अनुशासन - यह धैर्य


शाम घिरने के बाद घर से निकली हूँ। चौराहे पर बने फव्वारे के चारों ओर बिछी घास पर समुद्री बगुलों का झुंड अठखेलियाँ कर रहा है। रात के झुटपुटे में पार्क की तेज़ रौशनी के बावजूद दूर से इनके सिर, पैर और पूँछ नहीं दिखाई देते। टेनिस की गेंद जैसे सफ़ेद बुर्राक ये बगुले इमारात को गुलाबी सर्दी की देन हैं और शहर के हर प्राकृतिक नुक्कड़ को अपने सौंदर्य से भर देते हैं। मुश्किल से आठ इंच लंबे इन बगुलों के झुंड बहुत बड़े होते हैं। इस चौराहे पर बैठा झुंड शायद 50-60 से कम का नहीं होगा।

थोड़ा आगे बढ़ती हूँ तो सड़क के ऊपर बने पुल से नीचे की ओर फैली घास की ढलान पर ये सैकड़ों की संख्या में बैठे हैं। सब समान दूरी पर, एक ही ओर मुख किए हुए। इनको देखकर विश्वास हो जाता है कि ऊपरवाले ने बुद्धि और कौशल बाँटते समय मानव के साथ बड़ा पक्षपात किया है। यह अनुशासन, यह धैर्य बिना पुलिस और डंडे के हमारी दुनिया में मुश्किल है। गई थी सब्ज़ी लेने आधे घंटे बाद मंडी के बाहर आई हूँ और देखती हूँ कि अभी भी वैसे ही बैठे हैं सब, अपनी मौन साधना में। शायद यही मुद्रा देखकर किसी ने इन्हें बगुला भगत कहा होगा।

दाहिनी ओर के चित्र में कैद झुंड थोड़ा छोटा है पर देखिए तो क्या अदा है... ऊपर वाले ने गर्दन पर थोड़ा पीछे एक काला टीका भी लगा दिया है। नज़र न लगे गोरे गोरे मुखड़े को...