मंगलवार, 7 जुलाई 2009

धुंध में डूबा ग्रीष्माकाश


जुलाई अगस्त के महीने मध्यपूर्व में गर्मी के होते हैं। कभी ऐसी गर्मी देखी है जब आसमान कोहरे से ढक जाए? इमारात में पहली बार जब ऐसी धुंध देखी तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा क्योंकि भारत में तो धुंध सिर्फ सर्दियों के दिनों में होती थी। गर्मी के मौसम में यहाँ आमतौर पर पाँच-सात दिन ऐसे होते ही हैं। आज शारजाह में वही कोहरेवाला दिन है। दोपहर तक दुबई और शारजाह का कोहरा काफ़ी कुछ छँट गया था जबकि आबूधाबी में इसके दिनभर जमे रहने की संभावना जताई गई है। गर्मी भी कलेंडर देखकर आती है। जैसे इंतज़ार कर रही हो कि कब जून खत्म हो और कब वो अपने कदम धरा पर उतारे।

भारत में होने वाली मानसूनी बारिश खाड़ी के देशों में घनी नमी पैदा करती है। पिछले दो दिनों से नमी का स्तर बढ़ कर ९० प्रतिशत तक पहुँच रहा था। शाम को बाहर टहलना पसीने में नहाने जैसा था। नमी से तापमान में तेज गिरावट हुई और आज मौसम पर धुंध छा गई। समाचार है कि कुवैत, सऊदी और ईराक की ओर से उठने वाली उत्तर पश्चिमी हवाओं से बना धूल का तूफ़ान इमारात की ओर बढ़ रहा हैं। यह तूफ़ान आगामी तीन दिनों तक साँस की तकलीफ़ वालों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है पर शुभ समाचार यह है, कि पिछले दो दिनों में ५० डिग्री सेलसियस से ऊपर चढ़ता हुआ अधिकतम तापमान, आने वाले तीन दिनों तक ४० डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाएगा। नमी का स्तर भी कम होकर ५५ प्रतिशत पर आ गया है। सो गर्मी की तंग साँस में राहत पाकर लोग भी सड़कों पर आ गए हैं देखिए चित्र में एक नवयुवक किस तरह के हथियारों से लैस होकर गर्मी का आनंद ले रहा है।

नमी, धुंध और रेत के तूफ़ान खाड़ी देशों के लिए कोई नई बात नहीं लोग इनका जमकर मज़ा लूटते हैं। जरा पारा ४० डिग्री पर पहुँचा नहीं कि समुद्र तटों बाज़ारों, फुहारों और आइस्क्रीम की दूकानों पर मेले लग जाते हैं। अखबार छापते रहते हैं कि गर्मियों में सुरक्षित कैसे रहें- छाता हमेशा साथ रखें... त्वचा को नम रखने के लिए कोई क्रीम लगाएँ... पुदीना, इलायची या सौंफ़ चबाते रहें... तरबूज, नाशपाती और आम खाएँ... जूते की बजाय खुले सैंडिल पहनें और त्वचा जल जाए तो ठंडा पानी डालें। उत्तर भारत की सख्त गर्मीवाली लखनऊ या जयपुर की कड़ी दोपहर में घंटों धूप में घूमने के बावजूद त्वचा जलने का अनुभव मुझे कभी नहीं हुआ। पर यहाँ १० मिनट की धूप में ज़रा सा समय बाहर रहने पर ही कलाई के पास एक लाल चकत्ता उभर आया है। दवा लगाई है। पहले यह काला होगा फिर पपड़ी बनकर झर जाएगा। माँ बचपन में कहती थीं- धूप में मत घूमो काली हो जाओगी। अब मैं उनसे कहती हूँ- भारत की धूप रंग चाहे बदल दे पर जलाती नहीं है।

9 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत सुन्दर वतन की मिट्टी से जुडे एहसास सदा ठँडक देते हैं आभार्

annapurna ने कहा…

mausam ki yah jaankaari mere liye nai hai !

achchhii post !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

भारत और उसकी धूप के प्रति आप की आसक्ति प्रशंशनीय है...जयपुर की गर्मी में हमने खूब वक्त गुज़ारा है कभी कोई चकता नहीं हुआ...आप सच कहती हैं....रोचक जानकारी दी है आपने...
नीरज

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

बहुत सुंदर जी.
मगलकामनाओ सहीत
हे प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई टाईगर

ओम आर्य ने कहा…

एक अच्छी जानकारी के साथ ..........मिट्टी के एहसास

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत ही अच्छा लिखा है आपने

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चाँद, बादल और शाम

गौतम राजरिशी ने कहा…

ये तो वाकई अद्‍भुत बात थी- गर्मी में धुंध।

किंतु भारत में धूप जलाती नहीं है, इस बात से सहमत नहीं...कभी ऊँची बर्फ़िली पहाड़ों पे मुस्तैद अपने सीमा-प्रहरियों से मुलाकात हो तो इसी धूप के किस्से पूछियेगा...राजस्थान के बार्डर पे खुद अपनी त्वचाओं में इतने बड़े-बड़े चकते निकले देखे हैं कि बारबेक्युड चिकेन की याद आये...

shiva jat ने कहा…

जय श्री कृष्णा
बहुत सुन्दर लिखा है आपकी बातों से देश भक्ति की अपने देश की माटी की खुशबु आती है
यही खुशबु थी जिसकी खातिर सुभाष, भगतसिह उधम सिंह मंगल पांडे ने इसे बचाने के लिए फांसी के फंदे को चुम लिया था
आप कृपा करके मेरे ब्लोग भी देखे और अपने विचार बताना की क्या यह अज्ञानी भी कुछ लिखने को लायक है जय श्री कृष्णा
http://jatshiva.blogspot.com

पूर्णिमा वर्मन ने कहा…

आपकी बात से सहमत हूँ गौतम राजरिशी जी। मेरे कुछ पर्वतारोही मित्रों का कहना है कि हिमालय पर त्वचा जलती है, राजस्थान के बार्डर पर भी ऐसा होना संभव है। मैंने वे स्थल देखे नहीं हैं। हिंदुस्तान की गर्मी के नाम पर जयपुर और लखनऊ की गर्मी का ही आनंद उठाया है।