सोमवार, 12 नवंबर 2007

ज़िदगी

चाहे बाँचो, चाहे पकड़ो, चाहे भीगो
एक आवाज़ है बस दिल से सुनी जाती है
कभी पन्ना, कभी खुशबू, कभी बादल
ज़िंदगी वक्त-सी टुकड़ों में उड़ी जाती है।

कभी अहसास-सी
बहती है नसों में हो कर
कभी उत्साह-सी
उड़ती है हर एक चेहरे पर
कभी बिल्ली की तरह
दुबकती है गोदी में
कभी तितली की तरह
हर ओर उड़ा करती है

चाहे गा लो, चाहे रंग लो, चाहे बालो
हर एक साँस में अनुरोध किए जाती है
कभी कविता, कभी चित्रक, कभी दीपक
आस की शक्ल में सपनों को सिये जाती है

कभी खिलती है
फूलों की तरह क्यारी में
कभी पत्तों की तरह
यों ही झरा करती है
कभी पत्थर की तरह
लगती है एक ठोकर-सी
कभी साये की तरह
साथ चला करती है

कभी सूरज, कभी बारिश, कभी सर्दी
आसमानों में कई रंग भरा करती है
कभी ये फूल, कभी पत्ता, कभी पत्थर
हर किसी रूप में अपनी-सी लगा करती है

6 टिप्‍पणियां:

prabhakar ने कहा…

क्या बात है वही प्रवाह!!

Manish ने कहा…

वाह पूर्णिमा जी बड़ी खुशी हुई आपका चिट्ठा देख कर। अब आपकी बेहतरीन रचनाएँ पढ़ना हम चिट्ठाकारों के लिए सुलभ हो जाएगा।
यूँ तो पूरी कविता ही सुंदर है पर ये पंक्तियाँ खास तौर पर पसंद आईं
कभी अहसास-सी
बहती है नसों में हो कर
कभी उत्साह-सी
उड़ती है हर एक चेहरे पर
कभी बिल्ली की तरह
दुबकती है गोदी में
कभी तितली की तरह
हर ओर उड़ा करती है
बहुत खूब !

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया रचना है।बधाई।
क्या खूब लिखा है-

कभी खिलती है
फूलों की तरह क्यारी में
कभी पत्तों की तरह
यों ही झरा करती है
कभी पत्थर की तरह
लगती है एक ठोकर-सी
कभी साये की तरह
साथ चला करती है

नीरज गोस्वामी ने कहा…

पूर्णिमा जी
हमेशा की तरह कमाल की रचना. क्या कहूँ मेरे पास शब्द ही नहीं .
नीरज

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

कभी ये फूल, कभी पत्ता, कभी पत्थर
हर किसी रूप में अपनी-सी लगा करती है

बहुत खूबसूरत रचन है.

एक नदिया है किनारे से कभी जुड़ती है
तो कन्ही धार बनी यूँ ही बहा करती है.

Pratik ने कहा…

बेहतरीन कविता... आपका ब्लॉग देखकर बहुत ख़ुशी हुई। अब तो यहाँ नियमित तौर पर आना होता रहेगा।