सोमवार, 4 अप्रैल 2011

दौड़ से दूर

कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय एक रचना में कहते हैं-
लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते, जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें, बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

घर का छोड़ना अक्सर फ़ायदेमंद होता है। आरामगाह से निकलकर ही तो हम दुनिया से लड़ने के लायक बनते हैं। पर आजकल की छोटी सी दुनिया में प्रतियोगिता और स्पर्धा के लिए दौड़ने-भागने की प्रवृत्ति संक्रामक रोग की तरह फैलने लगी है। फिर दौड़ भी साधारण नहीं, सही-गलत को भूलकर जैसे-तैसे आगे निकलने की प्रवृत्ति से मन-मस्तिष्क तो थकता ही है, चरित्र और संवेदना भी छले जाते हैं। हम जहाँ भी है वहाँ की कोई खुशी नहीं, जो हमारे पास है उसका उपभोग करने तक का समय नहीं बस एक दौड़ है, दौड़ते जाना है, आगे... और आगे, और आगे... इस दौड़ से हमें मिलना क्या है उसकी परवाह किए बिना। इस दौड़ के अंत में कितनी और कैसी थकान होने वाली है उसकी चिंता किए बगैर।

ऐसे समय में यह सोचना असीम मानसिक शांति देता है कि जहाँ हम हैं वहाँ ठहरे रहने में कितना सुख है! कितने लाभ, प्रतिष्ठा और शांति है! विस्तार हमेशा गहराई को कम करता है। विस्तार रुकता है तो गहराई बढ़ती है रिश्तों की और अपने विकास की। किसी विषय का विशेषज्ञ बनाने के लिए भी अध्ययन की गहराईयों की ओर मुड़ना पड़ता है। हम जहाँ तक पहुँचे हैं वह इसलिए कि पहले ही एक लंबा सफ़र तय हो चुका है तो फिर अब दौड़ कैसी? अनेक दौड़नेवाले लौटकर यही कहते हैं कि दौड़ का कोई सार्थक फल नहीं मिला। हमारा अपना स्थान चाहे वह घर हो या कार्योलय, जिसका चप्पा चप्पा हम जानते हैं, मालिक की तरह हमारा आदर करता है, माँ की तरह हमें प्यार करता है। नई जगह उस सम्मान और स्नेह को पाने और नए परिवेश में अपने को स्थापित करने में अथक श्रम और समय की आवश्यकता होती है। इस श्रम और समय को बचाकर किसी अन्य महत्वपूर्ण कार्य में लगया जा सकता है। दौड़ते हुए हमें अपनी जगह, अपना रंग-ढंग अपनी आदतें बार बार बदलनी पड़ती हैं। अक्सर तो हम भूल ही जाते हैं कि हम थे क्या। अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए दौड़ से बचना बेहतर है। आखिर यह दुनिया गोल है, हम जहाँ से चले थे लौटकर वहीं पहुँच जाते हैं फिर दौड़ का फ़ायदा?

इसलिए- कुछ पल शांति से बैठें, प्रकृति का आनंद लें, मज़ेदार खाना पकाएँ, पासवाली परचून की दूकान के बूढ़े मालिक से उसके स्वास्थ्य या परिवार का हाल पूछें, सड़क पर लगे हुए पेड़ों से दोस्ती करें, किसी पुराने दोस्त से फ़ोन पर बात करें, संगीत सुनें, दूसरों को दौड़ता हुआ देखें और महसूस करें कि दौड़ से बाहर निकलकर चिंतामुक्त हो आराम करना कितना सुखदायक है।

7 टिप्‍पणियां:

Abnish Singh Chauhan ने कहा…

"इसलिए- कुछ पल शांति से बैठें, प्रकृति का आनंद लें,"

आज के समय में बढ़ाते तनाव और मानसिक दुःख का यही कारण है: लोग अंधी दौड़ में शामिल है.
प्रस्तुतकर्ता एवं रचनाकार दोनों को बधाई एवं नवसंवत्सर की शुभकामनाएं

cmpershad ने कहा…

हम है यहीं, हम है यहां
इसके सिवा जाना कहां :)

elkaypee ने कहा…

Great thoughts!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हम तो घर से बाहर ही रहे, सीप ही नहीं मिली अब तक।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये सच है घर का आराम कहीं नही ... पर जिसको घुमंतू होने की आदत लग जाती है उसका क्या .... बीच समुंदर में जहाज़ का पंछी जहाज़ पर आ तो जाता है .... पर कुछ देर में फिर उड़ान को तैयार हो जाता है ...

Kumar Ravindra ने कहा…

'चोंच में आकाश' में 'दौड़ से दूर' में पस्तुत लघु आलेख हमारी आज की आपाधापीभरी जिजीविषा पर एक सटीक टिप्पणी है | साधुवाद इस प्रस्तुति हेतु | कुछ अलग ढंग से मैंने यही बात अपने रक नवगीत में कही है |


प्रश्न अज़ब था


'बहुत ज़गह जाने से
क्या ज्ञानी हो जाते हैं ?'

प्रश्न अज़ब था बाबूजी का
हम चकराये थे
दुनिया-भर में घूम-घूमकर
हम बौराये थे

सकल विश्व के
हाट-लाट के गुन हम गाते हैं

बाबूजी पिछली पीढ़ी के
चिंतन भी पिछड़ा
वे कहते - 'सब कुछ है अंदर
मन है बहुत बड़ा'

किस्से पुरखों के
वे अक्सर हमें सुनाते हैं

उनके लेखे
सूरज देवता -धरती मैया है
अपना गली-मोहल्ला ही बस
उनकी ढैया है

संग राम के
सिंधु-पार यों वे हो आते हैं

उनका आँगन अन्तरिक्ष है
स्वर्ग वही उनका
वहीँ बाँचते वे चिट्ठा
अपने गुन-अवगुन का

तारों की
छैयाँ में ही वे रात बिताते हैं


नव संवत्सर के हार्दिक अभिनन्दन सहित
कुमार रवीन्द्र

पूर्णिमा वर्मन ने कहा…

अविनाश सिंह चौहान, सी.एम. प्रसाद जी, एलकेपीजी, प्रवीण पांडेय दिगंबर नस्वा और आदरणीय कुमार रवीन्द्र जी, यहाँ पधारने और टिप्पणी करने के लिये हार्दिक आभार। आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिये प्रेरणादायक हैं। आशा है यह आशीर्वाद मिलता रहेगा।